सिरौलीगौसपुर/ बाराबंकी। सदा अधर्म पर धर्म की विजय होती है और अंततः असत्य पर सत्य की ही जीत होती है। यह भावपूर्ण संदेश परमपूज्य कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज ‘महाराज’ ने श्रीराम कथा के अंतिम दिवस श्रद्धालुओं को दिया। कथा स्थल पर उपस्थित श्रोताओं ने भक्ति, श्रद्धा और भाव-विभोर वातावरण में श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात किया।अंतिम दिवस की श्रीराम कथा का वर्णन करते हुए पूज्य व्यास ने कहा कि दूसरों की संपत्ति चाहे कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। चैदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर जब भगवान श्रीराम अयोध्या पहुंचे तो समूची अयोध्या खुशियों से झूम उठी। यह प्रसंग हमें त्याग, मर्यादा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।पूज्य व्यास जी ने कहा कि रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह हमें आदर, सेवा, भोग, त्याग और मर्यादा का ज्ञान देती है तथा यह भी सिखाती है कि दूसरों की संपत्ति और अधिकारों का सम्मान करना ही सच्चा धर्म है। कथा के दौरान सीताहरण, लंका दहन, राम-रावण युद्ध और विभीषण के राज्याभिषेक जैसे प्रसंगों का उन्होंने अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक वर्णन किया, जिससे श्रोता भाव-विभोर हो उठे।उन्होंने बताया कि भगवान कण-कण में विराजमान हैं और दीन-दुखियों व जरूरतमंदों की सेवा ही सच्ची भक्ति है। जिस प्रकार भगवान श्रीराम ने वनवासियों, आदिवासियों और दीन-दुखियों को संगठित कर उनके कष्ट दूर किए और उसी संगठित शक्ति से समाज की बुराइयों का नाश किया, उसी प्रकार आज भी अच्छे लोगों को एकजुट कर समाज से कुरीतियों को समाप्त किया जा सकता है।पूज्य व्यास जी ने श्रोताओं से आह्वान किया कि जैसे श्रीराम ने अपने प्रेम से वनवासियों को अपना भक्त बनाया और उनके दुख दूर किए, वैसे ही प्रत्येक रामभक्त को सेवा, सहयोग और सद्कर्म के इस पुनीत कार्य में सहभागी बनना चाहिए। यही सच्चा रामकार्य है।
कथा के समापन पर पूज्य व्यास जी ने श्रीराम के आदर्श चरित्र का स्मरण कराते हुए कहा कि बुराई और असत्य अधिक समय तक नहीं टिकते। अंततः सत्य की ही विजय होती है और धर्म सदैव अधर्म पर विजय प्राप्त करता आया है। इस संदेश के साथ श्रीराम कथा का भावपूर्ण समापन हुआ, जिससे श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति, सेवा और सत्य का संकल्प और अधिक दृढ़ हो गया।
