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बाराबंकीः मुम्बई मे लाडली मिडिया अवार्ड से सम्मानित जिले का लाल ! बुन्देलखण्ड की जल सहेलियों पर बनी फिल्म को लैगिंक संवेदनशीलता के लिए मिला अवार्ड


बाराबंकी। पॉपुलेशन फर्स्ट एवं यूएनएफपीए द्वारा संयुक्त रूप  मुंबई के टाटा थिएटर में आयोजित एक कार्यक्रम में जिले के लखपेड़बाग निवासी प्रभात तिवारी और उनके सहयोगी भागीरथ श्रीवास को फिल्म के निर्माण के लिए लाडली मिडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह अवार्ड बुंदेलखंड की जल सहेली पर बनी फिल्म में  लैंगिक संवेदनशीलता के लिए दिया गया। फिल्म का कथानक  पहाड़ काटकर अपने गांव तक पानी लाने वाली जल सहेलियों पर आधारित है। फिल्म डाउन टू अर्थ इंडिया द्वारा फिल्माई गई है। बताते चलें फिल्म में बुन्देलखण्ड  के एक गाँव की महिलाओं द्वारा पहाड़ों को काट कर पानी लाने के लिए किये गए प्रयास का जीवंत चित्रण किया गया। फिल्म का निर्माण करने वाले प्रभात तिवारी का जन्म  जनपद अयोध्या तहसील  रूदौली  के पटरंगा में हुआ। मूलतः यह जिले के लखपेड़बाग के रहने वाले है और वर्तमान में  दिल्ली बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार है। प्रभात तिवारी के पिता अमित तिवारी पेशे से शिक्षक है और माता अर्चना तिवारी शिक्षिका। बेटे के अवार्ड से नवाजे जाने पर उनकी आखें खुशी से छलक उठी उन्होंने कहा प्रभात शुरू से ही लेखन शैली का धनी रहा पत्रकारिता क्षेत्र में आने के बाद उन्होंने बड़ी जनसमस्याओं को लेकर देश भर में  जोखिम भरी बड़ी स्टोरी की। परिवार और रिश्तेदारों में इस अवार्ड को लेकर खुशी का महौल है, अमित तिवारी ने आगे कहा कि एक छोटे से गाँव से निकलकर उनका बेटा आज अपने जिले और गाँव का नाम राष्ट्रीय फलक पर रोशन कर रहा है यह हमारे लिए गर्व का क्षण है। तो वही दूरभाष पर  प्रभात ने इस सम्मान को “बेहद विनम्र करने वाला” बताते हुए कहा कि यह पुरस्कार उन महिलाओं का है जिनकी कहानी इस फिल्म के केंद्र में है। उन्होंने कहा, “मैं अपने जीवन की उन सभी अद्भुत महिलाओं का भी गहराई से आभारी हूँ, जिन्होंने मेरी पूर्वधारणाओं को चुनौती दी, मेरी सोच को आकार दिया और मुझे सिर्फ एक बेहतर रिपोर्टर ही नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में मार्गदर्शन किया।प्रभात ने बताया कि फिल्म बुंदेलखंड के उन गांवों की असाधारण कथा प्रस्तुत करती है, जहाँ पानी की गंभीर कमी और जातिगत बाधाओं के बावजूद महिलाओं ने हार मानने के बजाय संघर्ष और सामूहिक प्रयास का रास्ता चुना। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे स्थानीय महिलाओं ने एक पहाड़ी को काटकर अपने गाँव तक पानी पहुँचाने का रास्ता बनाया एक ऐसा प्रयास जिसने न केवल भूगोल बदला, बल्कि सामाजिक संरचनाओं को भी चुनौती दी।यह पहल स्थानीय महिलाओं के साहस, नेतृत्व और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। उन्होंने सिद्ध किया कि जमीनी स्तर पर एकजुट होकर किया गया प्रयास किसी भी संकट को अवसर में बदल सकता है।प्रभात कुमार ने कहा कि यह पुरस्कार उन जल सहेलियों के साहस, दृष्टि और उस जज्बे को समर्पित है, जिसने उन्हें सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि बदलाव की अग्रणी शक्ति बनाया।

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