बाराबंकी। मसौली के ग्राम रजईपुर को विद्यार्थियों के प्रयोग के लिए चयनित किया गया है। यहां खेती को ईको टूरिज्म और लो कार्बन इकोनामी बनाने की शुरुआत हो चुकी है। भूमि पर प्रयोग पोलैंड से पीएचडी कर रही छात्रा रितु चैधरी तथा लखनऊ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने शुरू किया। सामान्य तौर पर खेतिहर भूमि में 1.1 प्रतिशत तक पाई जाने वाली जैविक कार्बन अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। इसे कैसे बढ़ाया जाए व तत्वों की पूर्ति किसान कैसे करें, इसके लिए छात्र-छात्राएं कार्ययोजना तैयार कर विश्वविद्यालय में प्रस्तुत करेंगे।
मसौली के रजाईपुर में भूमि परीक्षण के लिए विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अध्ययन में लगे हैं। प्रगतिशील किसान विपिन वर्मा के फार्म पर व्रोकला पर्यावरण एवं जीवन विज्ञान विश्वविद्यालय की रितु चैधरी तथा लखनऊ विश्वविद्यालय की अंकिता शर्मा के नेतृत्व में विद्यार्थियों की टीम ने भूमि परीक्षण का कार्य शुरू किया है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में लो-कार्बन इकोनामी की संभावनाओं पर चर्चा कर सुधार करना है। जमीन में कार्बन और पोषक तत्वों को कैसे बढ़ाया जाए, इसकी कार्ययोजना बनाई जाएगी।
रजाईपुर गांव में आयोजित बैठक में किसानों को बताया गया कि खेती को ईको फ्रेंडली माडल बनाना है। इसके लिए रजाईपुर गांव चुना गया है। ग्रामीण सामूहिक रूप से अपने खेतों और घरों के पास छोटे-छोटे होम स्टे बनाकर ईको टूरिज्म को बढ़ावा दें। इस मौके पर 25 किसानों ने भविष्य में सामूहिक रूप से इस माडल को अपनाने पर सहमति जताई। बैठक में जोर दिया गया कि खेती को लो कार्बन तकनीकों के साथ जोड़कर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटा जा सकता हैप्रगतिशील किसान विपिन वर्मा ने बताया कि फसलों में अंधाधुंध रासायनिक खादों और दवाओं के प्रयोग से पोषक तत्व घटते जा रहे हैं। पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक खाद न डालने व फसल अवशेषों को जला देने से भूमि की उत्पादकता घटी है। वह बताते हैं कि भूमि में जैविक कार्बन घटकर न्यूनतम स्तर पर आ गया है। भूमि में जीवांश बढ़ाने, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, कैलशियम, मैग्निशियम, लोहा तांबा, जस्ता, मैग्नीज आदि आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व मिलने से भूमि उपजाऊ बन जाती है।
