पीलीभीत। श्रावण मास हिन्दू सनातन परंपरा में आस्था और आराधना का सर्वाधिक पवित्र काल माना जाता है। विशेषकर शिवभक्तों के लिए यह महीना जीवन की साधना का केन्द्र बन जाता है। भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा से ओतप्रोत यह मास न केवल धार्मिक चेतना को प्रबल करता है, बल्कि सामाजिक समरसता, अनुशासन और लोक संस्कृति को भी एक नई ऊर्जा प्रदान करता है।
सोमवार को आयोजित काँवड़ यात्रा और अलखेश्वर महादेव पर श्रद्धालुओं द्वारा जलाभिषेक इसी सांस्कृतिक-सामूहिक आस्था का सशक्त उदाहरण है। खमरियापुल स्थित श्रीपरमअक्रियधाम में हजारों शिवभक्तों का एकत्र होना यह दर्शाता है कि आज भी जनमानस की जड़ें अपनी परंपरा से जुड़ी हुई हैं।विधायक एवं महामंडलेश्वर स्वामी प्रवक्तानंद महाराज का स्वयं कांवड़ियों के साथ जलाभिषेक में भाग लेना न केवल उनकी धार्मिक आस्था को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जब जनप्रतिनिधि जनता के साथ श्रद्धा में सम्मिलित होते हैं, तो सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर एक सशक्त संदेश जाता है। उनका श्रद्धालुओं का अभिनंदन एवं स्वागत कर जलाभिषेक में सम्मिलित होना जनसेवा और संतभाव के अद्भुत संगम को रेखांकित करता है।
श्रावण मास की ये धार्मिक यात्राएं केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि यह समाज को अनुशासन, समर्पण, और सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाने वाले आयोजन हैं। काँवड़ यात्रा में सहभागिता से भौगोलिक दूरियां मिटती हैं, वर्ग और जाति की सीमाएं समाप्त होती हैं और हर व्यक्ति ष्बोल बमष् के उद्घोष के साथ एक ही परंपरा की धारा में बहता है।ऐसे आयोजनों का प्रशासन, समाजसेवी संगठनों और आम नागरिकों द्वारा सहयोग किया जाना यह सुनिश्चित करता है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत सिर्फ पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर जीवंत बनी रहें। आज यह आवश्यक है कि हम श्रावण मास जैसे धार्मिक अवसरों को न केवल भक्ति के पर्व के रूप में मनाएं, बल्कि इन्हें सामाजिक चेतना और सद्भावना के मंच के रूप में भी विकसित करें। यही शिवभक्ति की सच्ची साधना होगी।