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क्या इस तरह जातिवाद खत्म करेगी मोदी सरकार


  • एनडीए इंडिया सावधान अब ओबीसी नहीं सहेंगे अपमान

देश में जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं उसी तरह तेजी के साथ चलते हुए सभी राजनीतिक दल अपना अपना जुगाड़ फिट करने में बैठ गए हैं, जिसमें वर्तमान दौर की बात करें तो इंडिया और एनडीए नाम के गठबंधन अपने अपने समर्थित दलों को इकट्ठा करके चुनावी तैयारी में लग गए हैं। लेकिन देश भर आरक्षण और ओबीसी विरोधी होने का झेलने वाली भाजपा सरकार जातिवाद सामाजिक भेदभाव समाप्त करने के दावे पर खरा नहीं उतर पाई है मंगलवार को मोदी सरकार ने विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना में एक नाई को किसी की दाढ़ी बनाते हुए जारी डाक टिकट से साफ कर दिया कि आप लोग खुद को कितना भी हिंदू मानते रहे या कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न देने की मांग करते रहे लेकिन हमारी सरकार की नजर में आपकी हैसियत एक सैलून संचालक से ज्यादा नहीं है।




हालांकि वर्तमान में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव व केंद्र में होने वाले लोकसभा चुनाव की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, तथा अपने मियां मुंह मिठ्ठू बनकर ओबीसी के वोट लेने का ताना-बाना बुन लिया है । वहीं बिना आरक्षण व्यवस्था में बांटे महिलाओं को तेंतीस प्रतिशत आरक्षण संविधान का खुला उल्लंघन माना जा रहा है क्योंकि आरक्षण व्यवस्था तो सरकार की निति नियत पर आधारित भी है ओबीसी एससी एसटी को संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार आरक्षण की व्यवस्था पहले से ही चली आ रही है हां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अब शैक्षिक सामाजिक आर्थिक रूप से मजबूत सामान्य जातियों की महिलाएं भी आरक्षण का सबसे बड़ा हिस्सा ले सकेंगी वैसे भी सीबीएसई आईसीएसई में पढ़ने वालों की मेरिट के सामने बेसिक एजुकेशन की मेरिट कैसे मुकाबला कर सकती हैं खैर यह भी सरकार की मर्जी जिसे कोई नहीं रोक सकता।



फिलहाल मुझे यह कहने में संकोच नहीं है की चुनावी जंग में केवल कांग्रेस और भाजपा क्षेत्रीय दलों को भले ही अपने साथ लगाने का काम कर रही हो लेकिन उत्तर प्रदेश की हालत इससे अलग है यहां क्षेत्रीय दल में गिने जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में लगातार दूरी बढ़ रही है। मजेदार बात तो यह है कि देश में रहने वाले एससी ओबीसी की बदौलत चुनावी जंग जीतने में माहिर सभी दल इन्हें सरकार में हिस्सेदारी देने से बचकर इन्हीं आरक्षित वर्ग को ठिकाने लगाने का काम कर रहे हैं। कोई दल भले ही इनके हितों का कितना भी दवा करें लेकिन टिकट वितरण करते समय इनको न तो यह बड़ा मतदाता दिखाई नहीं पड़ता, और ना ही महिलाओं की याद आती है यदि वाकई आप लोग बिना भेदभाव की शपथ लेते हैं तो क्यों नहीं अपनी अपनी पार्टी में टिकट वितरण करते समय आरक्षण देते। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि शायद ही कोई ऐसा दल हो जिसको वोट के समय भले ही उनकी याद आती हो लेकिन टिकट बांटते समय कोई यह भी नहीं पूछता कि कहीं अमूक जाति का कोई व्यक्ति तो टिकट पाने से नहीं छूट गया।है। लेकिन जैसे जैसे सामाजिक जागरूकता में तेजी आ रही है वैसे ही एससी ओबीसी में आने वाली यह जातियां अपना हक और अधिकार मांगने निकल पड़ी है। अब ओबीसी को अपने सम्मान की चिंता सताने लगी है और तो और अब चैथे वर्ण में मानी गई यह जातियां धार्मिक पुस्तकों में भी किया गया अपमान बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में भले ही कोई राजनीतिक दल हिंदू मुस्लिम सिख इसाई के नाम पर चुनाव जीतने की गलतफहमी पालता रहे लेकिन यह मतदाता लकीर का फकीर न रहकर अपना अधिकार मांगने निकल पड़ा है। वह चाहता है कि यदि वोट प्रतिशत एससी ओबीसी का 70ः प्रतिशत है तो मुख्यमंत्री गवर्नर केंद्रीय मंत्री ,राज्यमंत्री सहित जिले के कलेक्टर कप्तान कमिश्नर आईजी डीआईजी एसडीएम सीओ तहसीलदार एवं थाना अध्यक्ष भी आरक्षण के हिसाब से नियुक्त होने चाहिए, इतना ही नहीं अब आरक्षित वर्ग ने देश भर में होने वाली ठेकेदारी प्रथा में भी हिस्सेदारी मांगनी शुरू कर दी है हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में निर्माण कार्यों के ठेकेदारों में आरक्षण व्यवस्था लागू करने का काम किया था जो धीरे-धीरे समाप्त हो रही है वर्तमान में केंद्र सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी ने जब जॉइंट सेक्रेटरी और सेक्रेटरी के पद पर लैटरल एंट्री के द्वारा नियुक्ति दी तो इनको लेकर भी आरक्षित वर्ग के लोगों ने सरकार चला रही भाजपा को कटघरे में खड़ा करने से कोई कसर नहीं छोड़ी और तो और पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद लगातार हो रही निष्क्रियता पर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। तेजी से हो रहे निजीकरण पर भी आरक्षित वर्ग के लोगों ने सवाल दागने शुरू कर दिए हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं लोगों में अब वोट संख्या के हिसाब से लोगों में सत्ता की ललक में बड़ा इजाफा हुआ है यही कारण है कि अब जहां ओबीसी वर्ग भाजपा कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर रहा है वहीं सपा बसपा की बख्शीस भी नहीं कर रहा है यही कारण रहा कि जब इंडिया की पहली बैठक में अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य जयंत चैधरी व चंद्रशेखर आजाद को साथ नहीं ले गए तो उनके समर्थकों ने अखिलेश यादव को कटघरे में खड़ा करने में कसर नहीं छोड़ी। जब भाजपा ने सबसे ज्यादा वोट डलवाने वाले केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो ओबीसी में निराशा दौड गई जिसका परिणाम यह रहा कि सरकार चलाने वाली भाजपा को बाईस के विधान सभा चुनाव में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा और जब केशव मौर्य चुनाव हार गए तो अधिकांश पिछड़ों ने भाजपाइयों पर ही उन्हें हराने का आरोप लगा दिया। जब आज सत्ता विहीन होने के बाद सपा बसपा आरक्षित वर्ग की वकालत का दावा करती है तो ओबीसी सहित सभी आरक्षित वर्ग के लोग यह कहने में संकोच नहीं करते की जब सरकार में थे और केंद्र सरकार को लम्बे समय चलवाया तब क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं बना सके कि कोलेजियम सिस्टम समाप्त हो जाता और सेना हो या अन्य बड़ी नौकरी मिडिया हो या उधोगपति सभी जगह भागेदारी क्यों नहीं कराई, चाहते तो जातिवार जनगणना सामाजिक न्याय की रिपोर्ट ही लागू करा देते। आज आरक्षित वर्ग के हितैषी होने का दावा करते हैं कुल मिलाकर मेरा साफ साफ कहना है सबसे ज्यादा वोट रखने वाली आरक्षित वर्ग की जातियों ने अब लकीर के फकीर बनना बंद कर दिया है और मजेदार बात यह है इन्हें सभी दल एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नजर आने लगे हैं। लेकिन इसके बावजूद मैं किसी दल या सरकार को दोष देने से पहले जातिगत आधार पर संगठन चलाने वाले लोगों को दोषी मानता हूं क्योंकि उन सभी को कोई मजबूत उद्देश्य नहीं है।

विनेश ठाकुर, सम्पादक Verified Badge

Reported by: विधान केसर

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