लखनऊ। राजधानी लखनऊ में अधिकांश अधिकारियों के ड्राइवर भी खुद को अधिकारी से कम नहीं समझते। चाहे वो एक प्रमुख सचिव का ड्राइवर हो या लखनऊ के किसी क्षेत्र के एसीपी या थाना प्रभारी का ड्राइवर हो। ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्योंकि शासन और पुलिस विभाग में मिली गाड़ियों में जो सुविधा उपलब्ध होते हैं वे केवल अधिकारी ही नहीं बल्कि संबंधित अधिकारी के ड्राइवर भी उसका लुत्फ उठाते हैं।
बात करें अगर पुलिस विभाग की तो अक्सर एसीपी या थाना प्रभारी की गाड़ियों में लगे हूटर और ब्लू-रेड लाइट (वीआईपी लाइट) को सिर्फ एसीपी या थाना प्रभारी ही इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उनके ड्राइवर भी बड़े शान से आम जन के सामने अपना रुआब दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हुए कई जगह नजर आए।
क्या एक ड्राइवर गाड़ी में आधिकारिक सुविधाओं का फायदा ले सकता है?, तो मानकों के हिसाब से तो अधिकारी के घर वाले नहीं ले सकते, ड्राइवर तो बहुत दूर की बात है। पर अफसोस है कि राजधानी लखनऊ की सड़कों पर अगर हूटर और रेड-ब्ल्यू लाइट (वीआईपी लाइट) चला कर एक ड्राइवर गाड़ी का इस्तेमाल कर रहा है, तो हम यही सोचते हैं शायद संबंधित अधिकारी सवार है या राउंड पर है, पर ये गलत है। तो ड्राइवर द्वारा उपयोग किए जाने वाली गाड़ी की आधिकारिक सुविधा पर लगाम कसना जरूरी है।
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