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साकेत कोर्ट का बड़ा फैसला! अमेरिका में मिला तलाक भारत में नहीं चलेगा


अमेरिका की अदालत से मिला तलाक का फैसला भारत में अपने आप मान्य नहीं हो जाएगा. साकेत स्थित फैमिली कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर विदेशी अदालत ने एकतरफा कार्यवाही में तलाक दिया हो और भारतीय पति या पत्नी को अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं मिला हो तो ऐसा फैसला भारत की अदालतों में निर्णायक और लागू नहीं माना जा सकता.

फैमिली कोर्ट की जज पूर्वा सरीन ने यह टिप्पणी उस मामले में की जिसमें पत्नी ने अमेरिका के मिसौरी राज्य के सेंट लुइस काउंटी की फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी. अमेरिकी अदालत ने पति की गैर-मौजूदगी में यानी एक्स-पार्टी कार्यवाही के दौरान विवाह को खत्म करने का आदेश दिया था. तलाक का आधार शादी का पूरी तरह टूट जाना बताया गया था. कोर्ट ने साफ किया कि भारत में केवल यह कहना कि पति-पत्नी का रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है अपने आप में तलाक का वैधानिक आधार नहीं है.

मामले के मुताबिक दंपती ने 20 दिसंबर 2015 को साकेत स्थित आर्य समाज मंदिर में शादी की थी. बाद में इस विवाह का पंजीकरण जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में भी कराया गया. कुछ समय बाद दोनों के बीच स्वभाव और वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे और वैवाहिक विवाद शुरू हो गया. इसके बाद पत्नी अमेरिका चली गई और वहां तलाक की कार्यवाही शुरू कर दी. उसने अमेरिकी अदालत से तलाक के साथ-साथ बच्चे की कस्टडी और गुजारा भत्ता भी मांगा.

उधर पति ने भारत में फैमिली कोर्ट का रुख करते हुए वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दाखिल की.इसमें उसने पत्नी को वापस वैवाहिक घर लौटने और उसके तथा नाबालिग बेटे के साथ रहने का निर्देश देने की मांग की.इसी बीच 20 अप्रैल को फैमिली कोर्ट को बताया गया कि पत्नी अमेरिकी अदालत से एकतरफा तलाक हासिल कर चुकी है. पति ने दलील दी कि उसने विदेशी अदालत की कार्यवाही रोकने के लिए भारत में याचिका उस समय दाखिल की थी जब अमेरिका की अदालत ने अभी तलाक का फैसला नहीं सुनाया था. इसलिए बाद में आया विदेशी तलाक का आदेश उसके मामले में राहत के रास्ते में बाधा नहीं बन सकता.

साकेत कोर्ट ने अमेरिकी फैसले की जांच करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक के लिए मुख्य रूप से दोष आधारित आधार और आपसी सहमति जैसे नो-फॉल्ट आधार को मान्यता दी गई है. क्रूरता, व्यभिचार और परित्याग जैसे आधार कानून में स्पष्ट रूप से दिए गए हैं.कोर्ट ने कहा कि शादी का पूरी तरह टूट जाने को हिंदू विवाह अधिनियम में सीधे तलाक के आधार के तौर पर मान्यता नहीं मिली है.

फैमिली कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी पूरी तरह टूट जाने के आधार पर तलाक देने की शक्ति सामान्य फैमिली कोर्ट के पास नहीं है.सुप्रीम कोर्ट संविधान के आर्टिकल 142 के तहत पूर्ण न्याय करने के लिए विशेष परिस्थितियों में इस आधार पर विवाह खत्म कर सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की निचली अदालतें इसी आधार को सामान्य तलाक का आधार मान लें.

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अमेरिकी अदालत की कार्यवाही एक्स-पार्टी थी. यानी पति को अपना बचाव पेश करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला. कोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालत का फैसला तभी भारत में निर्णायक माना जा सकता है जब वह कानून में तय शर्तों पर खरा उतरता हो. सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 और 14 विदेशी फैसलों की भारत में मान्यता और लागू होने से जुड़ी शर्तें तय करती हैं.

फैमिली कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विदेशी अदालत का फैसला न तो मामले के गुण-दोष पर सुनवाई के बाद दिया गया और न ही पति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला.. इसके अलावा तलाक का आधार भी ऐसा था जिसे भारतीय कानून मान्यता नहीं देता.कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला और उसे सुना भी नहीं गया..ऐसे में यह फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप भी नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अमेरिकी अदालत ने तलाक उन आधारों पर दिया, जिन्हें भारत में तलाक के लिए मान्यता प्राप्त नहीं है. साथ ही पति को सुनवाई का अवसर भी नहीं मिला। इसलिए यह फैसला CPC की धारा 13 में बताए गए अपवादों के दायरे में आता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी अदालत का तलाक का फैसला भारत में निर्णायक नहीं है और भारतीय अदालतों में इसे लागू नहीं माना जाएगा.

साकेत कोर्ट ने पति को राहत देते हुए उसे भारत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका या कानून के तहत कोई अन्य उचित याचिका जारी रखने की स्वतंत्रता दी है.कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि विदेशी अदालत से मिला तलाक भारत में तभी प्रभावी होगा जब वह भारतीय कानून और प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों पर खरा उतरता हो. सिर्फ विदेशी अदालत का आदेश होने से भारतीय अदालतें उसे स्वत: मान्यता देने के लिए बाध्य नहीं हैं.

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