SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे संवेदनशील कानून पर बहस करना आसान नहीं है। एक तरफ सदियों से सामाजिक अपमान, उत्पीड़न और हिंसा झेलते आए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समाज को प्रभावी कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है, तो दूसरी तरफ किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी उतना ही आवश्यक है कि कोई निर्दोष व्यक्ति केवल आरोप लग जाने भर से सामाजिक, आर्थिक और कानूनी रूप से बर्बाद न हो। यही संतुलन न्याय की असली कसौटी है।
किसी भी कानून की पवित्रता इस बात से तय नहीं होती कि उसका नाम कितना प्रभावशाली है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह वास्तविक पीड़ित को कितना न्याय देता है और निर्दोष व्यक्ति को गलत कार्रवाई से कितना बचाता है। यदि किसी दलित या आदिवासी नागरिक पर जाति के आधार पर हमला होता है, जमीन छीनी जाती है, सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, अपमानित किया जाता है या हिंसा की जाती है तो दोषी के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसमें किसी प्रकार की नरमी का प्रश्न नहीं उठता।
लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न पूछना भी लोकतंत्र-विरोधी नहीं है कि यदि किसी कानून के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आती हैं तो क्या उसकी निष्पक्ष समीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या किसी गरीब अतिपिछड़े, मजदूर, दस्तकार, अल्पसंख्यक या सामान्य वर्ग के व्यक्ति की जिंदगी कम महत्वपूर्ण है? क्या न्याय का आधार पीड़ित और आरोपी की जाति होनी चाहिए, या अपराध, साक्ष्य और वास्तविक परिस्थितियां?
आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस विषय पर खुली बहस को ही राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है। कोई कानून की समीक्षा की बात करे तो उसे दलित-विरोधी कह दिया जाता है और कोई कानून के संरक्षण की बात करे तो उसे गैर-दलित विरोधी बता दिया जाता है। यह सोच समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए घातक है। न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, मीडिया और सामाजिक संगठनों को इस विषय पर भावनाओं से ऊपर उठकर तथ्य, आंकड़े और न्यायिक परिणामों के आधार पर विमर्श करना चाहिए।
विशेष चिंता गरीब तबकों की है। संपन्न व्यक्ति मुकदमे, जमानत और वर्षों तक चलने वाली अदालत की प्रक्रिया का खर्च उठा सकता है, लेकिन गरीब नाई, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, कश्यप, निषाद, पाल, प्रजापति, विश्वकर्मा, सैनी, मजदूर या छोटा दुकानदार एक मुकदमे से आर्थिक रूप से टूट सकता है। उसी प्रकार गरीब दलित और आदिवासी पीड़ित को भी न्याय दिलाने के लिए सरकारी संरक्षण आवश्यक है। इसलिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें गरीब पीड़ित की जाति न पूछी जाए, केवल उसका उत्पीड़न देखा जाए।
सरकारी आर्थिक सहायता भी वास्तविक पीड़ित के पुनर्वास और सुरक्षा के लिए होनी चाहिए। यदि किसी मामले में सक्षम जांच या न्यायिक प्रक्रिया से यह सिद्ध हो जाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी, दुर्भावनापूर्ण या आर्थिक लाभ के उद्देश्य से की गई थी, तो उस स्थिति में जवाबदेही तय करने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही गलत मुकदमे के कारण जेल, रोजगार, प्रतिष्ठा और आर्थिक नुकसान झेलने वाले निर्दोष व्यक्ति को भी उचित प्रतिकर का अधिकार मिलना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि कानून के कथित दुरुपयोग को किसी एक समुदाय बनाम दूसरे समुदाय का प्रश्न बनाकर नहीं देखा जा सकता। प्रभावशाली लोग कमजोर लोगों को अपने विवादों में मोहरा बना सकते हैं। इसलिए किसी भी आरोप की विश्वसनीय, त्वरित और निष्पक्ष जांच सबसे बड़ी आवश्यकता है। वास्तविक अत्याचार का मामला हो तो मुकदमा मजबूती से चले, लेकिन निजी रंजिश, संपत्ति विवाद या राजनीतिक प्रतिशोध का मामला हो तो निर्दोष व्यक्ति को समय पर राहत मिले।
इंडियन जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ द्वारा उठाया गया मूल प्रश्न यही है कि कानून का पैमाना जाति नहीं, बल्कि अपराध की गंभीरता और साक्ष्य होना चाहिए। इस विचार पर सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन इस पर लोकतांत्रिक बहस से भागा नहीं जा सकता। किसी केंद्रीय कानून को समाप्त या प्रतिस्थापित करना संसद और संवैधानिक प्रक्रिया का विषय है, इसलिए अंतिम निर्णय भी व्यापक विधायी विमर्श, न्यायिक अनुभव, पीड़ित समुदायों की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संतुलन के आधार पर ही होना चाहिए।
भारत को ऐसी न्याय व्यवस्था चाहिए जिसमें दलित पर अत्याचार करने वाला भी न बचे और किसी निर्दोष अतिपिछड़े, पिछड़े, सामान्य, अल्पसंख्यक या अन्य नागरिक को झूठे मुकदमे में फंसाने वाला भी न बचे। न्याय तभी न्याय है जब वह सबके लिए समान रूप से निष्पक्ष दिखाई भी दे और हो भी।
कानून का लक्ष्य समाज को जातियों में बांटना नहीं, बल्कि अपराधी और पीड़ित के बीच न्याय का निष्पक्ष फैसला करना होना चाहिए।
विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’
सम्पादक, विधान केसरी
लखनऊ
