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दिहाड़ी मजदूर करने वाला परिवार, लेकिन बच्चों ने कर दिया कमाल


ओडिशा के कंधमाल जिले के एक दूरदराज गांव से ऐसी सफलता की कहानी सामने आई है, जो मुश्किल हालात में पढ़ाई करने वाले लाखों छात्रों के लिए मिसाल बन सकती है। दिहाड़ी मजदूरी, खेती और आर्थिक तंगी के बीच जीवन बिताने वाले एक परिवार के चार बच्चों और एक भतीजी ने नीट परीक्षा पास कर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीट हासिल की है। इन बच्चों की सफलता की कहानी हर तरफ चर्चा का विषय बन गई है।

यह परिवार कंधमाल जिले के दरिंगबाड़ी ब्लॉक का रहने वाला है। यह इलाका राजधानी भुवनेश्वर से करीब 250 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है। परिवार के सामने लंबे समय से आर्थिक परेशानियां रही हैं। जर्जर घर में रहने वाले इस परिवार की जरूरतें दिहाड़ी मजदूरी, खेती और उधार के पैसों से पूरी होती रही हैं। इस परिवार की कहानी के केंद्र में हैं 73 साल के बुर्सी प्रधान और उनकी 62 साल की पत्नी अनुसया प्रधान। बुर्सी ने परिवार का खर्च चलाने और बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए कई सालों तक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया। उन्होंने केरल में भी मजदूरी की। परिवार में कुल सात बच्चे हैं। आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि अगर किसी दिन काम नहीं मिलता था, तो उस दिन की मजदूरी भी हाथ से चली जाती थी। इसके बावजूद बुर्सी और अनुसया ने अपने बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। समय के साथ बुर्सी की तबीयत खराब होने लगी और उन्हें वापस गांव लौटना पड़ा। अब परिवार सीमित आमदनी, खेती और उधार के सहारे अपना जीवन चला रहा है।

परिवार में मेडिकल शिक्षा का सफर सबसे पहले बड़े बेटे बिभीषण प्रधान से शुरू हुआ। साल 2021 में उन्होंने नीट में सफलता हासिल की और कोरापुट के श्री लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एमबीबीएस में दाखिला लिया। अगले ही साल उनकी बहन मोनालिसा प्रधान ने भी नीट पास किया और उसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला हासिल कर लिया। मोनालिसा की कहानी भी संघर्ष से भरी रही। नीट की तैयारी के दौरान उन्होंने ब्रह्मपुर की एक कपड़े की दुकान में काम किया। इसके साथ ही उन्होंने अपने बड़े भाई बिभीषण की मेडिकल पढ़ाई में भी मदद की। बाद में एक डॉक्टर से मिली आर्थिक सहायता ने भी मोनालिसा की मेडिकल शिक्षा जारी रखने में मदद की।

परिवार की सफलता यहीं नहीं रुकी। इस साल परिवार के दो और बच्चों ने नीट पास कर एमबीबीएस में दाखिला हासिल किया। असरिया प्रधान को भवानीपटना के शहीद रेंडो माझी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में सीट मिली है, जबकि उनकी बहन सुनेमी प्रधान का दाखिला भीम भोई मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, बलांगीर में हुआ है। असरिया के बड़े भाई और बहन ने नीट की तैयारी के दौरान उन्हें काफी प्रेरित किया और उनका मार्गदर्शन भी किया। यानी परिवार में पहले सफल हुए बच्चों ने बाद में आने वाले भाई-बहनों के लिए एक तरह से मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

इसी परिवार की एक और सदस्य मिनाक्षी प्रधान ने भी इस साल नीट परीक्षा में सफलता हासिल की है। मिनाक्षी, बुर्सी प्रधान के छोटे भाई की बेटी हैं और इसी परिवार के साथ रहती हैं। मिनाक्षी को पुरी के श्री जगन्नाथ मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एमबीबीएस में दाखिला मिला है। इस तरह अब बुर्सी और अनुसया के चार बच्चे और उनकी भतीजी, यानी कुल पांच युवा, ओडिशा के अलग-अलग सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं।

इस परिवार की सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि बच्चों के पास महंगी कोचिंग या बड़े शहरों में मिलने वाली सुविधाएं नहीं थीं। असरिया और सुनेमी ने बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद नीट की तैयारी शुरू की। दोनों ने ब्रह्मपुर में एक छोटा-सा घर किराए पर लिया और वहीं रहकर साथ में पढ़ाई की।आर्थिक परेशानियों के बावजूद दोनों ने बिना किसी औपचारिक कोचिंग के नीट परीक्षा पास की। परिवार के बड़े बच्चों की सफलता ने छोटे भाई-बहनों को भी आगे बढ़ने का हौसला दिया। एक के बाद एक परिवार के बच्चे मेडिकल की पढ़ाई में प्रवेश करते गए और आखिरकार यह संख्या पांच तक पहुंच गई।

परिवार के लिए पांच बच्चों का मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना गर्व की बात है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने खड़ी है। एक मेडिकल छात्र की पढ़ाई का खर्च उठाना ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए मुश्किल होता है। ऐसे में पांच मेडिकल छात्रों की पढ़ाई का खर्च उठाना परिवार के लिए बहुत बड़ा बोझ बन गया है। परिवार की 62 वर्षीय अनुसया प्रधान खेतों में मजदूरी करती हैं। वह इस बात से खुश हैं कि उनके चार बच्चे और भतीजी डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी पढ़ाई का खर्च कैसे उठाया जाएगा, इसे लेकर परिवार चिंतित है। इस साल दाखिले से जुड़े खर्चों को पूरा करने के लिए परिवार को पहले ही कर्ज लेना पड़ा है। आपको बता दें कि इससे पहले NEET 2026 में 304वीं रैंक पाने वाले आदर्श की कहानी भी वायरल हुई थी। आदर्श के पिता मजदूरी करते हैं। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी आदर्श की तारीफ की थी।

कई सालों तक दिहाड़ी मजदूरी, खेती और उधार के सहारे जीवन चलाने वाले ओडिशा के कंधमाल के इस परिवार के सामने अब अपने पांच मेडिकल छात्रों की पढ़ाई जारी रखने की चुनौती है। फिर भी कंधमाल के इस परिवार की कहानी यह दिखाती है कि सीमित संसाधनों और कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद मेहनत, परिवार के सहयोग और एक-दूसरे से मिली प्रेरणा के दम पर बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है

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