भांवरकोल/गाजीपुर। क्षेत्र के कनुवान गांव में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मां काली की वार्षिक पूजा सोमवार को हल्की बारिश के बीच विधि-विधान और श्रद्धा के साथ संपन्न हुई। पूजा में गांव के सभी वर्गों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मां काली से गांव की सुख-शांति, समृद्धि तथा दैवीय आपदाओं से रक्षा की कामना की।
मान्यता है कि दैवीय आपदा और महामारी से गांव की रक्षा के लिए मां काली के साथ डीह बाबा एवं माता सायर की पूजा-अर्चना की जाती है। इसे लेकर पूरे गांव में उत्साह और भक्तिमय वातावरण बना रहा। सुबह से दोपहर तक मां काली मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। मंदिर परिसर में मां काली को दूध का कराहा भी चढ़ाया गया।
सैकड़ों वर्षों से चली आ रही सावनी पूजा की परंपरा को गांव के लोगों ने आज भी उसी श्रद्धा और भाव के साथ कायम रखा है। गांव में आज भी पुरानी परंपराएं जीवंत हैं। मां काली की पूजा शुरू होने से पहले गांव में डुग्गी बजाकर लोगों को पूजा की सूचना देने की परंपरा है और डुग्गी बजने के साथ ही मां काली की पूजा की शुरुआत होती है।
सुबह से ही महिलाएं स्वच्छ वस्त्र धारण कर हाथों में कलश, छाक और गंगाजल लेकर मां काली को धार देने के लिए मंदिर पहुंचीं। महिलाएं भक्ति गीत गाते हुए माता का आह्वान करती रहीं। घरों में तड़के ही मां काली को पूड़ी और गुलवरा का भोग लगाकर पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद देवी मंदिरों में धार चढ़ाई गई।
सामूहिक पूजन के दौरान मां काली को नारियल, खप्पर और चुनरी अर्पित की गई। पंडितों के अनुसार पूजा का मुख्य उद्देश्य ग्रामवासियों एवं क्षेत्रवासियों की सुरक्षा और सुख-शांति के लिए मां काली से प्रार्थना करना है। ग्रामीणों में मान्यता है कि इस पूजा से गांव पर बाहरी आपदा और बीमारियों का प्रकोप नहीं होता तथा पशु-पक्षियों की भी रक्षा होती है।
पूजा के दौरान मां काली के पुजारी (पंथी) ने श्रद्धालुओं के साथ गाजे-बाजे के बीच मां काली की परिक्रमा की और पूरे परिसर में जुलूस निकाला गया। इस दौरान श्रद्धालु मां काली के जयकारे लगाते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इसके बाद पंडितों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ हवन-पूजन कराया गया। आरती के पश्चात श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।
शाम के समय कनुवान गांव के ब्राह्मणों को सामूहिक भोज कराने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। ग्रामीणों ने बताया कि यह परंपरा गांव की एकता, सामाजिक समरसता और धार्मिक आस्था का प्रतीक है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
