लखनऊ। सिस्टम जब पूरी तरह संवेदनहीन और बेपरवाह हो जाए, तो जनता न्याय की आस में घुट-घुट कर मरने को मजबूर हो जाती है। नगर निगम जोन 2 से बाबू के पद से सेवानिवृत्त हुए राम कुमार की मौत को चार साल बीत चुके हैं, लेकिन उनकी बुजुर्ग विधवा शांति देवी आज भी अपने पति की जायज पेंशन के लिए दफ्तरों की चैखट घिस रही हैं।
आगे-पीछे कोई सहारा न होने के कारण शांति देवी पाई-पाई को तरस रही हैं। राशन के भारी कर्ज में डूबने के बाद अब वह पिछले एक महीने से एक दूर के रिश्तेदार के तरस पर दो वक्त की रोटी खाकर जिंदा हैं। दवा, इलाज और मोबाइल रिचार्ज तक के लिए उनके पास पैसे नहीं बचे हैं।
नगर निगम के बेपरवाह अफसरों का आलम यह है कि वे हर बार कागजात जमा करवा लेते हैं और फिर बुजुर्ग महिला को दफ्तर-दर-दफ्तर टहलाते रहते हैं। रोते हुए शांति देवी का दर्द छलका, ष्मैंने सोचा था कि हमारे शहर की मेयर एक महिला हैं, तो शायद एक अकेली विधवा का दर्द समझा जाएगा और सुनवाई होगी... पर यहाँ तो पत्थर के आगे सिर पटकना है।
बड़े सवाल यह है कि चार साल से एक दिवंगत कर्मचारी की विधवा को पेंशन न देना प्रशासनिक लापरवाही है या सरासर भ्रष्टाचार? क्या महिला जनप्रतिनिधि के होते हुए भी एक बेबस बुजुर्ग महिला की चीख नगर निगम की बहुमंजिला इमारतों की दीवारों को पार नहीं कर पा रही?
अधिकारियों की यह टालमटोल की नीति केवल एक फाइल को नहीं लटका रही, बल्कि एक लाचार बुजुर्ग महिला को तिल-तिल मरने की धकेल रही है। अब देखना यह है कि सो रहा प्रशासन इस चीख को सुनकर जागेगा या किसी बड़े हादसे का इंतजार करेगा।
