सुलतानपुर। देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ माने जाने वाले किसान की आर्थिक स्थिति पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसान परिवारों को सालाना ₹6,000 की सहायता तीन किस्तों में दी जाती है। यानी हिसाब लगाएं तो किसान के हिस्से में करीब ₹16.44 प्रतिदिन की सरकारी सहायता आती है।
सवाल यह नहीं है कि किसान को ₹6,000 क्यों दिए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जिस किसान के पसीने से देश की रसोई चलती है, उसकी आर्थिक सुरक्षा का मूल्य इतनी छोटी रकम में क्यों समेट दिया गया है? उसे “अन्नदाता” कहकर सम्मानित करने और उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति सुधारने के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है?
किसान खेत में बीज डालने से लेकर फसल मंडी तक पहुंचाने के बीच मौसम, महंगाई, कर्ज, बाजार की अनिश्चितता, बिचैलियों और बढ़ती उत्पादन लागत से जूझता है। खाद, बीज, डीजल, सिंचाई, मजदूरी और कृषि मशीनरी की लागत लगातार उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी रहती है। इसके बावजूद किसान की आय के सवाल का जवाब अक्सर सरकारी योजनाओं और कुछ हजार रुपये की सहायता तक सीमित दिखाई देता है।
निश्चित रूप से ₹6,000 की सहायता किसान के छोटे-मोटे कृषि खर्च में मददगार हो सकती है, लेकिन सहायता और आर्थिक न्याय में जमीन-आसमान का अंतर है। किसान को केवल सरकारी किश्त का लाभार्थी नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण उत्पादक के रूप में देखने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्तों और किसान को मिलने वाली सहायता के बीच अंतर पर भी सवाल उठते हैं। 2025 में संशोधन के बाद सांसदों के वेतन और विभिन्न भत्तों में वृद्धि हुई। जनप्रतिनिधियों को काम करने के लिए वेतन और संसाधन मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्नदाता की आर्थिक सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता और प्राथमिकता मिल रही है?
किसान को दया नहीं, अपनी उपज का उचित मूल्य चाहिए। उसे केवल खाते में पैसा नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था चाहिए जिसमें उत्पादन लागत के बाद उसके हाथ में सम्मानजनक आय बचे। उसे पर्याप्त सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, पारदर्शी ऋण व्यवस्था, भंडारण, प्रभावी फसल बीमा और मजबूत बाजार व्यवस्था की आवश्यकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसान को कब तक सरकारी योजनाओं का लाभार्थी बनाकर देखा जाएगा? जिस व्यक्ति के श्रम से देश के करोड़ों लोगों की थाली भरती है, वह केवल सहायता पाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की खाद्य व्यवस्था का आधार है।
किसान के खाते में ₹2,000 की किश्त डालना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन उसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसे फसल का उचित मूल्य मिले, उत्पादन लागत नियंत्रित हो, बाजार में बिचैलियों का दबाव कम हो और प्राकृतिक आपदा की स्थिति में उसे वास्तविक आर्थिक सुरक्षा मिले।
किसान को ₹6,000 दीजिए, लेकिन उसकी मेहनत का मूल्य भी सुनिश्चित कीजिए। सहायता दीजिए, लेकिन ऐसी कृषि नीति बनाइए कि वह हमेशा सहायता पर निर्भर न रहे।
अगर किसान को सम्मान के शब्द तो मिलें, लेकिन फसल बेचते समय लागत निकालना मुश्किल हो जाए, तो यह सम्मान अधूरा है। अन्नदाता को चुनावी नारों में सम्मान नहीं, खेत की मेड़ पर सुरक्षा और मंडी में उसकी मेहनत का उचित मूल्य चाहिए।
वरना यह व्यवस्था उस सपेरे की बीन जैसी प्रतीत होगी, जिसमें एक हाथ से तमाशा दिखाया जाता है और दूसरे हाथ से जेब खाली कर दी जाती है। किसान को सम्मान का तमगा पहनाकर यदि उसकी आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित न की जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र का वास्तविक इम्तिहान केवल संसद की भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि किसान के घर और खेत में होता है। जिस दिन किसान अपनी फसल बेचकर कर्ज चुकाने की चिंता से मुक्त होगा, उसके बच्चों के भविष्य को लेकर भय कम होगा और उसकी मेहनत उसे गरिमापूर्ण जीवन दे सकेगी, उसी दिन “अन्नदाता” शब्द वास्तव में सार्थक होगा।
सवाल सिर्फ ₹6,000 का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसने किसान की वर्षों की मेहनत और आर्थिक संघर्ष को एक सरकारी किश्त के आंकड़े में समेट दिया है।
जिस किसान के खेत में राष्ट्र का भविष्य उगता है, उसके हाथ में पूरे साल के संघर्ष के बाद यदि लगभग ₹16 प्रतिदिन का सरकारी सहारा ही दिखाई दे, तो व्यवस्था को स्वयं से पूछना होगाकृहमने अन्नदाता का सम्मान किया है या उसकी विवशता का प्रबंधन?
किसान को भीख नहीं, अपनी मेहनत का मूल्य चाहिए। दया नहीं, न्याय चाहिए। सरकारी कृपा नहीं, आर्थिक आत्मनिर्भरता चाहिए।
क्योंकि जिस दिन अन्नदाता अपने ही अन्न के बाजार में असहाय हो गया, उस दिन संकट केवल किसान का नहीं रहेगाकृवह देश की खाद्य सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक नैतिकता का संकट बन जाएगा।
