लखनऊ। उत्तर प्रदेश के विद्युत विभाग में इन दिनों “दंड” और “तैनाती” की नीति चर्चा का नहीं बल्कि गंभीर विवाद का विषय बन चुकी है। विभागीय गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है कृ आखिर नियम सबके लिए समान हैं या फिर चेहरों के हिसाब से बदल जाते हैं?
एक ओर ऐसे अभियंता और कर्मचारी हैं जिन्हें मामूली आरोपों, तकनीकी व्यवधानों या प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर मध्यांचल से बाहर दूसरी कंपनियों में भेज दिया गया, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों में निलंबित हुए कर्मचारियों को बहाल कर राजधानी के मलाईदार जोनों में तैनाती दिए जाने की चर्चाएं विभाग में खुलेआम हो रही हैं।सूत्रों के अनुसार वर्टिकल व्यवस्था लागू होने से पहले राजधानी में तैनात अभियंताओं के बीच भय का माहौल बनाने के लिए कई कार्रवाइयों को “उदाहरण” के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
अमौसी जोन के कई अभियंताओं को एक साथ मध्यांचल से बाहर भेज दिया गया। किसी पर रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े क्षेत्रों में आपूर्ति बाधित होने का आरोप लगा, तो किसी को वृंदावन क्षेत्र में लंबी बिजली कटौती का जिम्मेदार ठहरा दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन कर्मचारियों को “दंड” देकर दूसरी कंपनियों में भेजा गया, उनमें कई का निलंबन तक नहीं हुआ था। कई ऐसे अधिकारी भी थे जिन्होंने पिछली भीषण गर्मियों में उपकेंद्रों का सफल संचालन कर व्यवस्था संभाली थी, लेकिन मामूली आरोपों में उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
प्रबंधन द्वारा एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर यह प्रचारित किया गया कि अब निलंबित कर्मचारियों को संबंधित जोन से हटाकर यूपीपीसीएल के माध्यम से दूसरी कंपनियों में तैनात किया जाएगा। इसे “बृहद दंड” की नीति बताया गया।
लेकिन विभागीय सूत्रों का दावा है कि न तो इस प्रकार का कोई प्रस्ताव बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से पारित हुआ और न ही कर्मचारी नियमावली अथवा विद्युत सेवा नियमों में इसका कोई स्पष्ट प्रावधान मौजूद है।
यानी सवाल साफ है यदि ऐसा कोई नियम विधिक रूप से अस्तित्व में ही नहीं था, तो कर्मचारियों को किस आधार पर दूसरी कंपनियों में भेजा गया?यदि नियम था, तो फिर उसका पालन चुनिंदा मामलों में ही क्यों हुआ?
सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि हाल के महीनों में भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित दो अवर अभियंताओं को बहाल कर राजधानी के दूसरे जोनों में तैनाती दे दी गई।जबकि पूर्व में कई जिम्मेदार और फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों को छोटी प्रशासनिक त्रुटियों पर कठोर कार्रवाई झेलनी पड़ी।विभाग के भीतर अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या ईमानदार और फील्ड में काम करने वाले कर्मचारी ही कार्रवाई के आसान लक्ष्य हैं?और क्या प्रभावशाली या विवादित कर्मचारियों के लिए नियम अलग हैं?
करीब एक वर्ष पहले भी मध्य जोन से निलंबित दो अवर अभियंताओं को बहाल कर उसी जोन में तैनाती दे दी गई थी। उस समय भी विभाग में कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे थे, लेकिन मामला दबा दिया गया।अब एक बार फिर वही तस्वीर सामने आने लगी है, जहां नियम पुस्तिका से ज्यादा महत्व “प्रबंधन की मंशा” को मिलता दिखाई दे रहा है।विद्युत विभाग के भीतर कर्मचारी खुलकर भले न बोल पा रहे हों, लेकिन अंदरखाने एक ही चर्चा है “यहां नियम नहीं, रिश्ते और पसंद-नापसंद चल रही है।

