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समाज सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता-सुप्रीम कोर्ट


केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि संविधान निर्माताओं ने समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कानून बनाए थे और नौ-सदस्यीय संविधान पीठ इसे ’उलट’ नहीं सकती.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है. महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा कि तर्कवादी वे लोग हैं, जो धर्म सहित हर चीज को तर्क की कसौटी पर परखते हैं.

संजय हेगड़े ने कहा कि संविधान खुद अनुच्छेद 51ए(एच) जैसे प्रावधानों के माध्यम से तर्कवादी मूल्यों को समाहित करता है, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधारवादी सोच विकसित करने का कर्तव्य निर्धारित करता है. दिवंगत स्वामी अग्निवेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि संविधान ने विशेष रूप से हिंदू धर्म के भीतर धार्मिक सुधार की परिकल्पना सोच-समझकर की है.

मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि वे अपवर्जनात्मक धार्मिक प्रथाओं को पूर्ण संरक्षण प्रदान करें, खासकर तब जब ऐसी प्रथाएं समानता और गरिमा के अधिकार से मेल न खाती हों. उन्होंने अनुच्छेद 26 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान में 'कंट्रोल' के बजाय 'मैनेज' शब्द का इस्तेमाल किया गया है.

उन्होंने कहा, 'अनुच्छेद 26 में कंट्रोल की जगह मैनेज शब्द का उपयोग यह दर्शाता है कि संविधान का उद्देश्य संप्रदायों के अधिकारों और अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है.' मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की छह-सदस्यीय पीठ ने माना था कि अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपने संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार भी सीमित है.

उनकी दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनकी कुछ विशिष्ट विशेषताएं हैं. इसी कारण अनुच्छेद 30 मौजूद है. पचास के दशक या चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में भारत कैसा था? हमें विरासत में क्या मिला था? समाज में क्या कमियां थीं?' जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया, 'क्या आज हम नौ-सदस्यीय पीठ के रूप में इस सभ्यता की व्यवस्था को बदलने जा रहे हैं?'

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