- अति-दलित और अति-पिछड़े ही हैं वास्तविक 'बहुजन'
भारतीय राजनीति और सामाजिक न्याय की यात्रा में एक नया और जटिल मोड़ दिखाई दे रहा है। हाल ही में विनेश ठाकुर 'कर्पूरी' के वक्तव्य ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। उन्होंने अति-पिछड़ों और अति-दलितों को आगाह किया है कि उन्हें अब बाहरी ताकतों या 'मनुवादियों' से कहीं अधिक उन 'कथित अपनों' से सावधान रहने की जरूरत है, जो उनके हक का बड़ा हिस्सा डकार रहे हैं। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस जमीनी हकीकत का आईना है, जिसे दशकों से हाशिए पर खड़ा समाज महसूस कर रहा है।
हक की लड़ाई और आंतरिक अवरोध
सामाजिक न्याय का नारा बुलंद कर कई जातियों और समूहों ने सत्ता की सीढ़ियां चढ़ीं। मंडल आयोग के बाद पिछड़ों और दलितों की एकजुटता ने देश की राजनीति की दिशा बदली, लेकिन समय के साथ इस एकजुटता के भीतर ही एक 'मलाईदार परत' (Creamy Layer) और वर्चस्ववादी समूहों का उदय हुआ।
विनेश ठाकुर का संकेत स्पष्ट है:
पिछड़ों और दलितों के नाम पर मिलने वाले आरक्षण, संसाधनों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बड़ा हिस्सा कुछ प्रभावशाली उप-जातियां या परिवार हथिया लेते हैं।
जब एक ही वर्ग के भीतर कुछ लोग इतने सशक्त हो जाते हैं कि वे अपने ही भाइयों के अधिकारों का मार्ग अवरुद्ध करने लगें, तो 'अति-पिछड़ों' और 'अति-दलितों' का मोहभंग होना स्वाभाविक है। यह 'अपनों' के खिलाफ विद्रोह की पुकार है, क्योंकि संघर्ष के मैदान में सबसे पीछे खड़ा व्यक्ति आज भी वहीं खड़ा है, जबकि उसके नाम पर लड़ने वाले 'मसीहा' काफी आगे निकल चुके हैं।
क्यों जरूरी है स्वायत्त संघर्ष?
जब तक शोषित वर्ग अपनी विशिष्ट पहचान को एक व्यापक छतरी के नीचे ही देखता रहेगा, तब तक उसकी समस्याओं और मांगों को नजरअंदाज किया जाता रहेगा। 'अति' शब्द का प्रयोग ही यह सिद्ध करता है कि मुख्यधारा के दलित और पिछड़ा विमर्श में भी इन समुदायों की भूमिका गौण रही है।
संसाधनों का विकेंद्रीकरण: सरकारी योजनाओं और नौकरियों में जो लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए था, वह बीच में ही 'कथित अपनों' के द्वारा रोक लिया जाता है।
स्वतंत्र नेतृत्व: विनेश ठाकुर का आह्वान एक स्वतंत्र और सशक्त नेतृत्व की मांग करता है। जब तक अति-पिछड़ा वर्ग दूसरों की पालकी ढोता रहेगा, वह कभी स्वयं सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुँच पाएगा।
सावधानी ही सुरक्षा है
यह संदेश एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है: वैचारिक विरोधियों से लड़ना सरल है क्योंकि वे सामने से वार करते हैं, लेकिन उन 'अपनों' को पहचानना और उनसे दूरी बनाना अत्यंत कठिन है जो साथ खड़े होकर आपके हितों का सौदा करते हैं। राजनीति में इसे 'वोट बैंक' का खेल कहा जाता है, जहाँ संख्या बल अति-पिछड़ों का होता है, लेकिन सत्ता का सुख कुछ गिने-चुने चेहरे ही भोगते हैं।
निष्कर्ष
विनेश ठाकुर 'कर्पूरी' के ये विचार सामाजिक न्याय के आंदोलन के भीतर एक नई चेतना का संचार कर सकते हैं। अब समय आ गया है कि अति-पिछड़ा और अति-दलित समाज अपनी सामूहिक शक्ति को पहचाने और अपने अधिकारों के लिए एक ऐसी स्वायत्त लड़ाई लड़े, जिसमें उसका हिस्सा कोई और न छीन सके। यह लड़ाई किसी के 'विरोध' में कम और अपने 'अस्तित्व' की रक्षा के लिए अधिक है। यदि समाज का सबसे निचला तबका आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत है, तो निश्चित रूप से वर्तमान व्यवस्था और नेतृत्व, दोनों को कटघरे में खड़ा करने का समय आ गया है।
विनेश ठाकुर 'कर्पूरी'
सम्पादक, विधान केसरी
लखनऊ-संपर्क: 8954600000
