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रूद्रपुर: प्रशासन की अनदेखी के बीच कलेक्ट्रेट परिसर में दस्तावेज लेखक भवन पर अवैध कब्जे का आरोप, लाखों की सरकारी संपत्ति बदहाली की शिकार


रुद्रपुर। जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट परिसर में दस्तावेज लेखकों की सुविधा के लिए लाखों रुपये की लागत से निर्मित भवन इन दिनों बदहाली, अव्यवस्था और कथित अवैध कब्जे का शिकार बना हुआ है। सरकारी धन से तैयार कराई गई यह इमारत अब अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। जिस भवन को आम जनता और दस्तावेज लेखकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था, वह आज खंडहर में तब्दील होता दिखाई दे रहा है।

जानकारी के अनुसार कलेक्ट्रेट परिसर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग जमीन, संपत्ति, एग्रीमेंट, शपथ पत्र और अन्य कानूनी दस्तावेजों से संबंधित कार्यों के लिए पहुंचते हैं। लोगों को व्यवस्थित वातावरण और सुविधाजनक स्थान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रशासन द्वारा दस्तावेज लेखक भवन का निर्माण कराया गया था। इस भवन के निर्माण में सरकार के लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन वर्तमान में भवन का उपयोग अपने निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप नहीं हो पा रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि भवन लंबे समय से उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। भवन के आसपास गंदगी फैली हुई है, कई हिस्सों में टूट-फूट साफ दिखाई दे रही है और रखरखाव के अभाव में पूरी इमारत बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है। जिस भवन को जनता की सुविधा और व्यवस्थित कार्य संचालन के लिए तैयार किया गया था, वही अब अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बयां कर रहा है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि भवन में एक व्यक्ति ने लंबे समय से अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है और वहीं निवास कर रहा है। इससे सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने इस ओर ध्यान दिया होता तो सरकारी भवन की यह स्थिति नहीं होती। हैरानी की बात यह है कि जिस कलेक्ट्रेट परिसर में जिलाधिकारी समेत जिले के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालय मौजूद हैं, उसी परिसर में स्थित यह भवन धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार का लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिया गया, लेकिन भवन की उपयोगिता और रखरखाव सुनिश्चित करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।

लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि भवन में बैठे कुछ दस्तावेज लेखकों की कार्यप्रणाली और अव्यवस्थित कब्जों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में यह मामला अब सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग और प्रशासनिक उदासीनता का उदाहरण बनता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों और अधिवक्ताओं ने जिला प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कराने, भवन से अवैध कब्जा हटाने तथा उसे उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप उपयोग में लाने की मांग की है। साथ ही भवन की साफ-सफाई, मरम्मत और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने की भी मांग उठाई जा रही है।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और सरकारी संपत्ति को बदहाली से बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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