लखनऊ! उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) इस समय एक बड़े नीतिगत बदलाव से गुजर रही है। सपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे रहे आज़म खान जहां लंबे समय से कानूनी मुकदमों और जेल की सलाखों के पीछे वक्त गुजार रहे हैं, वहीं अब सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सपा नसीमुद्दीन सिद्दीकी को आज़म खान के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी, आज़म खान की कमी को पूरा कर पाएंगे और क्या मुस्लिम मतदाता इस नए 'भेष' को स्वीकार करेगा?
आज़म खान की कमी और सपा की मजबूरी
आज़म खान ने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी को सींचने में लगा दिया, लेकिन उनका शेष समय अदालती चक्करों और जेल में बीत रहा है। सपा समर्थकों और आम जनता के बीच अब यह सवाल जोर-शोर से उठ रहा है कि आखिर आज़म खान कब तक जेल में रहेंगे और सपा उनके कानूनी व राजनीतिक भविष्य को लेकर कितनी गंभीर है?
आज़म खान की अनुपस्थिति से पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए सपा ने बसपा के पूर्व कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर दांव लगाना शुरू किया है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि नसीमुद्दीन को आगे बढ़ाना सपा की मजबूरी भी है और रणनीति भी, ताकि मुस्लिम वोटबैंक में बिखराव को रोका जा सके।
क्या कोई बन पाया सच्चा 'मुस्लिम लीडर'?
उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास गवाह है कि आज़म खान हों या नसीमुद्दीन सिद्दीकी, दोनों में से कोई भी पूरे प्रदेश के स्तर पर सर्वमान्य 'मुस्लिम लीडर' के रूप में अपनी मजबूत पहचान स्थापित नहीं कर सका। क्षेत्र विशेष में प्रभाव होने के बावजूद, व्यापक स्तर पर इन्हें पार्टी के बड़े चेहरों के रूप में ही देखा गया, स्वतंत्र मुस्लिम नेता के रूप में नहीं।
दूसरी ओर, हैदराबाद से निकलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में पैर पसार रहे एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी खुद को एक स्वतंत्र मुस्लिम लीडर के रूप में तेजी से स्थापित कर रहे हैं। हालांकि, समाजवादी पार्टी और उसके समर्थक ओवैसी को 'भाजपा की बी-टीम' या 'भाजपा का एजेंट' बताने का कोई मौका नहीं छोड़ते, लेकिन ओवैसी की रैलियों में उमड़ती भीड़ सपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने के लिए काफी है।
मुख्य चुनौतियां और राजनीतिक विश्लेषण
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर करना जरूरी है:
वोटबैंक बनाम नेतृत्व: सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव में सिर्फ 'इस्तेमाल' होने वाला मुस्लिम समाज कभी अपना स्वतंत्र और मजबूत लीडर बना पाएगा? या वे हमेशा बड़ी पार्टियों के चेहरों के भरोसे ही रहेंगे?
कट्टरवाद बनाम समझदारी: इतिहास गवाह है कि गिने-चुने नेताओं को छोड़कर, ज्यादातर ने मुस्लिम लीडर बनने के लिए 'कट्टरवाद' का रास्ता अपनाया। लेकिन यह फॉर्मूला बार-बार फेल साबित हुआ है, क्योंकि मुस्लिम समाज का एक बड़ा और समझदार वर्ग कट्टरवाद को सिरे से खारिज करता है और विकास व सुरक्षा की राजनीति पसंद करता है।
निष्कर्ष: सपा को सिद्दीकी से कितना फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि: "नसीमुद्दीन सिद्दीकी का अपना एक राजनीतिक रसूख रहा है, लेकिन आज़म खान की जो 'मास अपील' और सपा के कोर वोटबैंक पर जो पकड़ थी, उसकी बराबरी करना सिद्दीकी के लिए एक बेहद कठिन चुनौती है। मुस्लिम मतदाता फिलहाल पशोपेश (असमंजस) में है।"
बसपा के बाद कांग्रेस में रहते भी सिद्दकी की अस्वीकार्यता जगजाहिर
सपा में शामिल होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिमों में कितनी पकड़ बना पाएंगे कितनी नहीं यह तो ईवीएम मशीन के अलावा कोई नहीं बता सकता फिलहाल उनके बारे में जहां बसपा में उनके नजदीकी रहे नेताओं का मानना है कि वे बसपा में रहते जब कभी मुस्लिम लीडर नहीं बन सकें और कांग्रेस में भी उनका यही हाल रहा तो सपा को नाम मात्र भी लाभ पहुंचा पाएंगे कहना मुश्किल है वैसे भी जिस कारण उन्हें बसपा से निकाला गया था उससे मुस्लिम लीडर ही नहीं अन्य जिम्मेदार लोग भी पूरी तरह वाकिफ हैं। खैर
आने वाले चुनाव तय करेंगे कि सपा का यह 'सिद्दीकी कार्ड' कितना फायदेमंद साबित होता है और क्या मुस्लिम समाज ओवैसी के 'स्वतंत्र नेतृत्व' की तरफ बढ़ता है या सपा के इस नए समीकरण पर भरोसा जताता है।
