चुनाव आने की सुगबुगाहट हो या सरकार जानें की चर्चा राजनेता किस तरह रंग बदलते हैं इसकी बानगी देखनी है तो राहुल गांधी अखिलेश यादव सहित मोदी जी सहित सभी नेताओं से भी मिलना पड़ेगा जो चुनाव से पहले भले ही अति पिछड़ी जातियों के घोर विरोधी रहे हो लेकिन चुनाव का समय नजदीक आया तो राहुल गांधी ने जहां एससी ओबीसी के आरक्षण का ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया है मैं पूछना चाहता हूं सबसे लम्बे समय तक देश की सरकार चलाने वाले राहुल गांधी से जब सत्ता ने तुमसे लम्बी दूरी बना ली तो आपको आरक्षण की याद सताने लगी आपको याद है राहुल जी जब आपने 2014 में भागते भागते आरक्षण को गरीबी उन्मूलन योजना या चुनाव जीत रणनीति बनाकर समाज उन मजबूत लोगों को दें दिया था जिन्हें धन धरती शिक्षा सम्मान का भंडार पैदा होते ही मिल जाता है किस मुंह से आपने नव्वे सेकेट्री में दो ओबीसी सेकेट्री की गिनती करा ली, अच्छा लगता यदि आप अपनी सरकार का रिकार्ड हाथ में लेकर सेकेट्री ज्वाइंट सेक्रेटरी का आंकड़ा प्रस्तुत करके कहते कि हां हमने कभी आरक्षित वर्ग के लोगों से विश्वास घात नहीं किया हालांकि मुझे आपसे इसलिए कोई शिकायत नहीं है कि हमारे अपने ही हमारे दुश्मन बनते रहे हैंआप यदि यही कह देते कि हमने कांग्रेस की सरकार में जो करना चाहिए था वह नहीं कर सकें, आज जब आपको सत्ता में वापसी की उम्मीद खत्म हो गई तो न सिर्फ जातिगत जनगणना कराने की याद आने लगी बल्कि एससी ओबीसी आरक्षण भी आपने चुनाव जीतने का हथियार बना लिया।
कान खोलकर सुनें राहुल गांधी जी यदि आपने इन पिछड़ी अतिपिछड़ी एससी, एसटी जातियों को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल न कर इनकी वास्तविक स्थिति को समझा होता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज न तो कांग्रेस की दुर्गति हो रही होती और न ही आरक्षित वर्ग बरबादी के मुहाने पर खड़ा दिखाई देता। मैं यह भी दावे के साथ कह सकता कि आज भी आप भले ही आरक्षित वर्ग के लोगों से कितना ही प्रेम का ढोंग कर ले लेकिन वास्तविकता की बात करें तो यह आपका केवल सत्ता हासिल करने का शिगुफा है जो शायद देश की जनता अच्छी तरह समझ चुकी है। यदि आपके अंदर जरा भी नैतिकता बची है तो आप जरा यह बताने का कष्ट करें कि कांग्रेस पार्टी ने आजादी के बाद से अब तक लंबे समय सरकार चलाने के बावजूद पिछड़ी एससी-एसटी ओबीसी एमबीसी की जन संख्या को आधार मानकर कितने लोगों को लोकसभा व विधानसभा में भेजने काम किया। यदि वाकई आप इन जातियों के हितैषी है तो आज ही अपनी पार्टी से जनसंख्या अनुपात स्वयं मानकर लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण की घोषणा करें और अपने गठबंधन साथियों से भी इस ओर ध्यान देने का सुझाव दें लेकिन आपको तो केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी दिखाई दे रही है जो शायद कभी आपको मिलने वाली नहीं है। रही बात आपके साथियों की तो आज भले ही लंबे समय से सरकार चला चुके अखिलेश जी पीडीएफ का फार्मूला बताकर वोट लेना चाहते हों लेकिन आरक्षित वर्ग यह अच्छी तरह से जानता है कि जिस तरह के आंकड़े यादव और कुर्मी के प्रस्तुत किए गए हैं वह वास्तव में सच्चे नहीं है और न ही पिछड़ो अति पिछड़ों की जनसंख्या वास्तविक रूप में दिखाई गई है। और इसके लिए हम किसी को दोषी क्यों माने हमें तो सपा ने भी मारा तो बसपा ने भी अतिदलित अतिपिछड़ी जातियों को दरकिनार किया इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में एससी एसटी ओबीसी व एमबीसी के लोग बड़े पैमाने पर निवास करते हैं तो हम क्यों न उसी अनुपात में इनको लोकसभा विधानसभा में मंत्री पद पर भेजने का काम करें ,लेकिन आपको भी चुनावी खेल जो खेलना था। मान्यवर मैं दावे के साथ कह सकता हूं अब चाहे बिहार की जनता हो या उत्तर प्रदेश की चाहें राजस्थान की हो या मध्य प्रदेश की अब किसी बहकावे में आने वाली नहीं है पढ़े लिखे लोग अच्छी तरह समझ चुके हैं कि हमारा दुश्मन और दोस्त कौन है अति पिछड़ों के सहारे अपनी सरकारी दुकान चलाने वाले नीतीश जी आप भी कान खोलकर सुन ले कि अब केंद्र में तो छोड़िए बिहार प्रदेश में भी आपकी यह काठ की हांडी चलने वाली नहीं है। रही बात अखिलेश यादव की तो उनके बारे में कुछ भी कहना उचित नहीं होगा जब उन्होंने देखा कि अब सरकार से कोसों दूर हो गए और लोकसभा चुनाव में भी कोई भरोसा करने को तैयार नहीं है तो ऐसी स्थिति में श्री अखिलेश यादव भी यादवों से शुद्र हो गए, जबकि शुद्र की श्रेणी में आने वाले लोगों का कहना है कि यदि वाकई अखिलेश यादव शूद्रों की श्रेणी में आते हैं तो इन आरक्षित वर्ग के लोगों के प्रति उनके मन में खास लगाव होता जो आज दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलता, हां श्री यादव भले ही अति पिछड़ों के सहारे सत्ता तक पहुंचाना चाहते हैं लेकिन पूरा उत्तर प्रदेश जानता है कि अखिलेश यादव मुसलमानों का ध्रुवीकरण कर केवल यादव नेताओं तक ही सीमित होकर रह गए हैं ऐसी स्थिति में यह आरक्षित वर्ग के लोग किसी पर कैसे भरोसा करें मेरी समझ से बाहर है।
विनेश ठाकुर कर्पूरी समर्थक एवं सम्पादक
विधान केसरी लखनऊ
