बलिया। जनपद में स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है, जहां एक महिला की ऑपरेशन के दौरान मौत ने न सिर्फ एक अस्पताल का दरवाजा बंद कराया, बल्कि पूरे सिस्टम की खिड़कियां खोल दीं। कार्रवाई और विरोध के बीच सच अब भी कहीं फाइलों में दबा नजर आ रहा है।
पथरी के ऑपरेशन के दौरान अनीशा नामक महिला की मौत के बाद प्रशासन ने अपूर्वा अस्पताल पर ताला जड़ दिया। सिटी मजिस्ट्रेट और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में अस्पताल को सील कर जांच शुरू कर दी गई। कागजों पर कार्रवाई तेज दिखी, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे स्वास्थ्य व्यवस्था की बीमारियां ठीक होंगी या सिर्फ एक और ‘फाइल’ तैयार होगी?
इधर, मरीज की मौत से आक्रोशित परिजनों और आम जनता ने सड़क पर उतरकर न्याय की मांग की। कैंडल मार्च से लेकर चेतावनी तक जनता का गुस्सा साफ दिखा, जैसे अब भरोसा इलाज से ज्यादा प्रदर्शन पर हो गया हो।
उधर, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (प्ड।) के बैनर तले चिकित्सकों ने प्रशासन की कार्रवाई को ‘एकतरफा’ बताते हुए विरोध शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि बिना पूरी जांच के अस्पताल सील करना न्याय नहीं, बल्कि दबाव में लिया गया फैसला है। डीएम और सीएमओ को सौंपे गए ज्ञापन में उन्होंने अस्पताल खोलने और चिकित्सकों पर कार्रवाई रोकने की मांग की, साथ ही चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो जिले के नर्सिंग होम बंद कर दिए जाएंगे।
इस बीच, एक और मामले में पूर्वांचल क्षेत्र के एक अस्पताल में प्रसूता रिंकू देवी की मौत पर पुलिस ने डॉक्टर आदित्य सिंह को हिरासत में ले लिया है। यानी 24 घंटे में दो अस्पतालों पर कार्रवाई और दोनों ही मामलों में मरीज की मौत।
प्रशासन की सक्रियता इस बार तेज जरूर दिख रही है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई समय पर होती तो शायद किसी की जान बच सकती थी? अक्सर शिकायत के बाद ही सिस्टम जागता है, और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। स्वास्थ्य महकमे की यही ‘देरी वाली तत्परता’ अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है।
वहीं दूसरी ओर, जिले में लगातार हो रही ऐसी घटनाओं ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमों की निगरानी, उपकरणों की गुणवत्ता और विशेषज्ञता की जांच क्या सिर्फ कागजों तक सीमित है? अगर नहीं, तो फिर बार-बार ऐसे मामले सामने क्यों आ रहे हैं, यह सवाल आम लोगों के मन में गूंज रहा है।
बताते चलें कि आईएमए से जुड़े चिकित्सकों का कहना है कि किसी भी घटना की निष्पक्ष जांच जरूरी है, लेकिन बिना निष्कर्ष के कठोर कार्रवाई से पूरे चिकित्सा समुदाय का मनोबल टूटता है। उनका तर्क है कि इलाज के दौरान जटिल परिस्थितियां भी सामने आती हैं, जिन्हें सीधे लापरवाही कहना उचित नहीं होता।
चिकित्सकों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इसी तरह दबाव में आकर कार्रवाई होती रही, तो डॉक्टरों के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने प्रशासन से संतुलित रुख अपनाने, चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और जांच पूरी होने तक किसी भी संस्थान को सील करने जैसी कार्रवाई पर पुनर्विचार की मांग की है।
