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प्रतापगढः भ्रष्टाचारियों की शरणस्थली बनी कुंडा तहसील! घूसकांड में जेल जा चुके राजस्वकर्मी फिर काबिज, आदेशों की धज्जियां


कुंडा/प्रतापगढ़।कुंडा तहसील में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की सरकारी नीति दम तोड़ती नजर आ रही है। रिश्वतखोरी में जेल जा चुके राजस्वकर्मियों की न केवल वापसी हुई, बल्कि उन्हें फिर से मलाईदार और संवेदनशील पदों पर बैठा दिया गया है।जिससे प्रशासनिक नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

 सूबे में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के दावों के बीच प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील एक बार फिर सुर्खियों में है लेकिन वजह शर्मनाक है। यहां रिश्वतखोरी के आरोप में जेल की हवा खा चुके राजस्वकर्मियों को दोबारा उसी तहसील में तैनाती देकर महत्वपूर्ण और कमाऊ जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। यह पूरा घटनाक्रम न केवल शासन के आदेशों की अनदेखी है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर भी सवालिया निशान लगा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, तहसील में पहले से ही विवादों में रहे कर्मचारियों ने अपने प्रभाव और ‘जुगाड़’ के दम पर न सिर्फ वापसी कराई, बल्कि वही पुराने पद और प्रभार भी हासिल कर लिए। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि जिले में भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई महज दिखावा बनकर रह गई है।

तहसीलदार न्यायिक न्यायालय में पेशकार और मत्स्य पट्टा का प्रभार देख चुके अनुराग श्रीवास्तव को पट्टी तहसील में एंटी करप्शन टीम ने रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार कर जेल भेजा था। जमानत पर छूटने के बाद उन्हें दोबारा कुंडा तहसील में तैनात कर उसी तरह के कार्यों का प्रभार दे दिया गया है।

इसी कड़ी में अयूब खान, जो पहले कुंडा में लेखपाल रह चुके थे, उन्हें भी सदर तहसील में राजस्व निरीक्षक रहते हुए घूस लेते पकड़ा गया और जेल भेजा गया था।  बतौर लेखपाल कुंडा में तैनाती के दौरान उनके ऊपर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोपों के बावजूद उनकी भी कुंडा में वापसी कराकर राजस्व अभिलेखागार जैसे अति संवेदनशील विभाग की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

इतना ही नहीं, प्रदीप दुबे जो रानीगंज में रिश्वत लेते गिरफ्तार हुए थे उन्हें भी कुंडा में अहम जिम्मेदारियों के साथ तैनात किया गया है। लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुंडा तहसील भ्रष्टाचारियों के लिए ‘सुरक्षित ठिकाना’ बन चुकी है।

सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इन कर्मचारियों के खिलाफ अब तक कोई ठोस विभागीय कार्रवाई नहीं हुई है। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं न कहीं उच्च स्तर पर संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते कार्रवाई की फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

मामले में जब एडीएम आदित्य प्रजापति से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उनका फोन बंद मिला। वहीं एसडीएम कुंडा वाचस्पति सिंह असहाय होते हुए बोले कि ये सभी कर्मचारी स्थानांतरण के बाद यहां आए हैं और एसआईआर फॉर्म भरने की प्रक्रिया के चलते तत्काल स्थानांतरण संभव नहीं हो सका। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च अधिकारियों से इनके स्थानांतरण के लिए पत्राचार किया गया है।

हालांकि, सवाल यह है कि क्या सिर्फ स्थानांतरण ही समाधान है? या फिर ऐसे मामलों में सख्त विभागीय कार्रवाई कर एक उदाहरण पेश किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी कर्मचारी भ्रष्टाचार की राह पर चलने से पहले सौ बार सोचे।

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