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लखनऊः युद्ध की आग में शांति दूत की भूमिका में भारत


आज जब विश्व के कई हिस्से युद्ध की आग में जल रहे हैंकृचाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजराइल-हमास संघर्ष या फिर अमेरिका ईरानकृपूरी मानवता एक अनिश्चित और भयावह दौर से गुजर रही है। इन संघर्षों ने न केवल लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया  है, लाखों घर  उजाड़े  है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी गहराई से झकझोर दिया है वहीं जन मानस मे घोर विषाक्त ने अपना घर बना लिया है। ऐसे संकटपूर्ण और विध्वंसक स्थिति में भारत एक संतुलित, विवेकशील और जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है। जहां उसने एक शांति संदेश की पहल की है बताते चलें कि

भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र हमेशा से शांति, सह-अस्तित्व और संवाद रहा है। जहां एक ओर विश्व के कई बड़े देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल होकर तनाव को बढ़ा रहे हैं, वहीं भारत ने हर मंच पर यह स्पष्ट किया है कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” यह कथन केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारत की सोच और उसकी वैश्विक जिम्मेदारी का परिचायक है।

भारत की नीति “वसुधैव कुटुंबकम” आज केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई दे रही है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के प्रयास, मानवीय सहायता और वैश्विक मंचों पर शांति की अपीलकृये सभी कदम भारत को एक संवेदनशील और मानवता के पक्षधर राष्ट्र के रूप में स्थापित करते हैं।

साथ ही, भारत ने कूटनीतिक संतुलन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। उसने एक ओर पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखा, तो दूसरी ओर रूस जैसे पुराने सहयोगियों के साथ भी अपनी रणनीतिक साझेदारी को बरकरार रखा। यह संतुलन न केवल भारत के हितों की रक्षा करता है, बल्कि उसे एक संभावित मध्यस्थ के रूप में भी स्थापित करता है।

आर्थिक मोर्चे पर भी भारत ने परिपक्वता का परिचय दिया है। वैश्विक संकट के बावजूद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने और अपने नागरिकों को राहत देने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं। यही कारण है कि आज भारत को एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।निष्कषर्रू एक उभरता वैश्विक नेतृत्व

विश्व में बढ़ते संघर्षों के बीच भारत की भूमिका केवल एक मूक दर्शक की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक की बनती जा रही है। शांति, संतुलन और मानवता के मूल्यों के साथ भारत जिस प्रकार आगे बढ़ रहा है, वह उसे आने वाले समय में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक मजबूत दावेदार बनाता है।

 डॉ नमिता दीक्षित

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