लखनऊ। नगर निगम लखनऊ की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। क्षेत्रीय पत्रकारों के लिए प्रस्तावित आश्रय स्थल से जुड़ी फाइल लगभग एक वर्ष से अधिक समय से अधिकारियों की लापरवाही की भेंट चढ़ी हुई है। हैरानी की बात यह है कि मामला एक विधायक द्वारा लिखे गए पत्र से संबंधित है, इसके बावजूद फाइल पर कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका।
मामला 19 फरवरी 2025 का है, जब सरोजनीनगर क्षेत्र के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने बुद्धेश्वर विकास महासभा के प्रदेश महामंत्री एवं वरिष्ठ पत्रकार सुखपाल सिंह के अनुरोध पर नगर निगम लखनऊ को पत्र लिखकर क्षेत्रीय पत्रकारों के लिए आश्रय स्थल हेतु भूमि चिन्हित करने का अनुरोध किया था। विधायक ने यह भी उल्लेख किया था कि भूमि उपलब्ध होने पर आश्रय स्थल का निर्माण वह अपनी विधायक निधि से कराएंगे।
सूत्रों के अनुसार नगर निगम मुख्यालय से यह फाइल दो दिन बाद ही स्थलीय आख्या के लिए जोन-8 कार्यालय भेज दी गई थी। आरोप है कि जोन-8 में तत्कालीन अवर अभियंता दीक्षा चैरसिया ने इस फाइल को करीब तीन महीने तक अपने पास ही दबाए रखा। पत्रकार द्वारा लगातार दौड़-भाग किए जाने के बाद 28 नवंबर 2025 को तत्कालीन लेखपाल अनूप गुप्ता ने उस पर रिपोर्ट लगाई। इसके बाद 8 दिसंबर 2025 को तत्कालीन नायब तहसीलदार रत्नेश ने भी अपनी आख्या लगा दी।
स्थलीय रिपोर्ट लगने के बाद फाइल मुख्यालय पहुंची, लेकिन यहां भी मामला आगे नहीं बढ़ सका। जानकारी के अनुसार 25 दिसंबर तक फाइल तहसीलदार अरविंद पांडे के पास पड़ी रही, जिन्होंने 26 दिसंबर को उस पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद फाइल का कोई अता-पता नहीं रहा।
हर सरकारी कार्यालय में आने-जाने वाले पत्रों का विवरण डाक बही में दर्ज किया जाता है, जिसमें पत्रांक संख्या, प्रेषक, संबंधित अधिकारी और अन्य विवरण अंकित होते हैं। लेकिन संपत्ति कार्यालय में 3 अक्टूबर 2025 के बाद इस फाइल का कोई उल्लेख ही नहीं मिला।
7 मार्च 2026 को जब आवेदक कार्यालय पहुंचे तो, पूर्व में संपत्ति प्रभारी का कार्यभार देख रहे अपर नगर आयुक्त प्रमोद कुमार श्रीवास्तव के कार्यालय में मौजूद सहायक एवं निजी सचिव ने बताया कि सभी पत्रांक डाक बही में दर्ज किए जाते हैं, संभव है कि अधिकारी ने फाइल व्यक्तिगत रूप से मंगा ली हो, इसलिए उसका विवरण दर्ज नहीं हो पाया।
हालांकि यह पूछे जाने पर कि 26 दिसंबर को मुख्यालय स्थित संपत्ति अनुभाग से अपर नगर आयुक्त कार्यालय में प्राप्त होने के बाद भी 7 मार्च तक फाइल डाक बही में क्यों दर्ज नहीं हुई, इसका कोई स्पष्ट उत्तर अधिकारियों के पास नहीं था।
अपर नगर आयुक्त कार्यालय में दर्ज पत्रांक यदि अक्टूबर 2025 के बाद संज्ञान में नहीं आया तो वह फाइल खो गई चोरी हो गई अथवा उसका क्या हुआ जिस अनुभाग को भेजी गई थी उससे संबंधित किसी कार्मिक से जानने की जरूरत क्यों नहीं समझी उस हेतु किसी प्रकार का पत्राचार क्यों नहीं किया गया
कार्मिकों की लापरवाही पर बड़ा सवाल क्या कोई अधिकारी महीनों तक किसी फाइल को बिना डाक बही में दर्ज किए अपने पास रख सकता है? यदि विधायक द्वारा लिखे गए पत्र का यह हाल है तो आम नागरिकों के प्रार्थना पत्रों की स्थिति क्या होती होगी।
सूत्रों की मानें तो अब अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए अधिकारी फाइल पर आपत्ति लगाकर उसे पुनः जोन-8 भेजने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि देरी की जिम्मेदारी से बचा जा सके।
अब देखना यह है कि पत्रकारों के हित से जुड़ी इस महत्वपूर्ण योजना को मंजूरी मिल पाएगी या फिर यह फाइल भी नगर निगम की फाइलों के ढेर में हमेशा के लिए दबकर रह जाएगी।
