1966 में जन्म लेकर 1990 में सामाजिक व्यवस्था को समझा और 2002 से अखबार चलाने का बाद जो राजनीति के बाजार में पाया वह अतिपिछड़ों अतिदलितो के हितों को लेकर झकझोरने वाला पाया जिसको लेकर देश के सभी दलों कितने भी दावे वादे किए लेकिन अंदर से झांककर देखा तो सब षड्यंत्रों का भंडार देखने को मिला मैं पूछना चाहता हूं वर्तमान समय खुद को बड़ा भारी अम्बेडकर और महापुरुष वादी समझने वाले नेताओं से कि भईया कब तक अपने निजी स्वार्थ में इन 45 प्रतिशत अतिपिछड़े अतिदलित जातियों का बेवकूफ बनाते रहोगे चलिए शुरू करते हैं देश प्रदेश में चलने वाली कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार से जिसने पाल प्रजापति सैनी कश्यप विश्वकर्मा बाल्मीकि कोरी सैन सविता नंद आदि जातियों का वोट तो लिया और सरकार भी बनी लेकिन शपथ लेते ही इन्हें ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी आज राहुल गांधी बड़े चिल्ला चिल्ला कर आरक्षित वर्ग की बात करते हैं जमकर अतिदलित और अतिपिछड़ी जातियों की वकालत करते नज़र आते हैं लेकिन कभी जन संख्या अनुपात में हिस्सेदारी देने की सोची भी है क्या कभी सोचा है किसी पाल प्रजापति सैनी कश्यप विश्वकर्मा बाल्मीकि कोरी सैन सविता नंद को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दें सत्ता से कोसों दूर ही सही फिर भी कभी सोचा है कि उत्तर प्रदेश बिहार बंगाल असम उड़ीसा मध्यप्रदेश उत्तराखंड सहित 28 राज्यों में 40 प्रतिशत मुख्यमंत्री के चेहरे अतिपिछड़ी और अतिदलित जातियों को घोषित कर दें। चलो करों की सैनी कश्यप विश्वकर्मा बाल्मीकि कोरी सैन सविता नंद समाज का व्यक्ति कांग्रेस की तरफ़ से देश में प्रधानमंत्री का चेहरा होगा करों घोषणा की उत्तर प्रदेश आपकी पार्टी अतिपिछड़े को मुख्यमंत्री बनाएगी नहीं करोगे मेरे भाई क्योंकि आप और आपकी पार्टी तमाम बड़े नेता इनके वोट के ठेकेदार तो है लेकिन सत्ता देने के पक्षधर न थे और ना कभी होंगे यही हाल भाजपा संघ सपा बसपा ही नहीं उत्तर प्रदेश में छुटभैय्ए दलों का भी जो बात तो बाबासाहेब आंबेडकर सहित तमाम महापुरुषों और तथागत गौतम बुद्ध को अपना प्रेरणाश्रोत मानने की करते हैं लेकिन अंदर झांककर देखते हैं तो ब्राह्मण बनिया ठाकुर नही दलित पिछड़े नेता ही अतिदलित और अतिपिछड़ी जातियों के दुश्मन नज़र आए और तो और हमने भी डेढ़ साल में जन सेवा दल के माध्यम से खुद को बड़े बड़े स्व घोषित मिशनरी प्रस्तुत करने वाले नेताओं को अंदर से झांककर देखा तो एक भी बाबासाहेब आंबेडकर या सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित नज़र नहीं आया लेकिन खुद को सबसे बड़ा चिंतक साबित करने में कोई नहीं छोड़ी। लेकिन जब अधिकारों की बात आती है तो भाजपा संघ जैसे संगठनों से चार क़दम आगे नज़र आते हैं कभी किसी दल की मानसिकता नहीं रहतीं की अतिदलित और अतिपिछड़ी जातियों को जन संख्या अनुपात में हिस्सेदारी देने की पहल करें मजेदार बात तो यह है कि अपनी अपनी पार्टी के मुखिया होने के बावजूद टिकट वितरण में जन संख्या अनुपात की अनदेखी कर सरकार बनने पर एम एल सी राज्य सभा की बात करते हैं और गलती से सरकार बन जाती है तो 35 प्रतिशत की संख्या में आने वाली अतिपिछड़ी जातियों और अतिदलित जातियों को केश कला माटी कला माली कला पिछड़ा वर्ग मत्स्य सफ़ाई आयोग अनूसूचित आयोग जैसे पद देकर खुद को बड़ा हितैषी होने का प्रमाण देते हैं हालांकि कभी-कभी मैं ऐसा करना इनकी चालाक मजबूरी समझता हूं क्योंकि यह जानते हैं यदि जन संख्या अनुपात में टिकट देकर विधायक सांसद बना दिए तो फिर ये अपने समाज का उत्पीड़न होने पर सरकार नहीं चलने देंगे या खुद सरकार बना लेंगे इस लिए किसी दल ने मंत्री विधायक सांसद भले ही बना दिए हों लेकिन नेता नही बनने दिया और यदि किसी ने बनने का प्रयास किया तो उसे अपने साथ लगाकर उसकी हैसियत को खत्म कर दिया गया आज बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयाई या तथागत बुद्ध को मानने वाले कितने भी हितैषी होने का दावा करते हों लेकिन दलित नेता को बहुजन आंदोलन मानते हैं और अपने से पांच गुना वोट रखनें वालों को बहुजन आंदोलन नहीं मानते अतिपिछड़ी जातियों का वोट लेकर बहन जी मुख्यमंत्री बनेंगी तो बहुजन हिताय बहुजन सुखाय कहलाएगा और अतिपिछड़ी जातियों का मुख्यमंत्री बनते का दावा करेगा तो वह बहुजन हिताय नहीं होगा कमाल की सोच रखते हैं स्वयं भू बहुजन के लोग अभी उत्तर प्रदेश में ही देख लो तेजी से सत्ता की तरफ दौड़ रहे नगीना सांसद हों या अखिलेश यादव बहन कुमारी मायावती हो या ओमप्रकाश राजभर संजय निषाद अनुप्रिया पटेल कोई अपनी पार्टी से जन संख्या अनुपात में टिकट देकर विधायक सांसद बनाने की घोषणा नहीं करता और बसपा से निकाले गए लोगों को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बहुजन समाज को मजबूत करने की बात करते हैं अरे भाई जब राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद हों तो किसी अतिपिछड़े या मुस्लिम अथवा बाल्मीकि कोरी को क्यों नहीं प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन्हें पावर दें देते लेकिन नियत साफ़ हों तो करें चलिए बीते दिनों आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सांसद चंद्रशेखर आजाद से बहुजन हितों को लेकर चर्चा हुई तो पाया कि जिस तरह सपा बसपा भाजपा कांग्रेस की नियत और निति अतिपिछड़ी और अतिदलित जातियों को अलग-अलग करके कम संख्या मानकर टिकट न देने की रही है या एक दो टिकट देने की रही है वहीं बातें मुझसे आजाद समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री सुनील चितौड़ ने कहते हुए बताया कि पाल प्रजापति सैनी कश्यप विश्वकर्मा बाल्मीकि कोरी सैन सविता नंद समाज के वोट कम संख्या में रहते हैं इसलिए ये चुनाव नहीं जीत सकते जबकि मेरे द्वारा उनसे स्वयं कहां गया की जब दो हजार वोट के पंजाबी सिंधी शुक्ला जी त्रिपाठी जी द्विवेदी जी चतुर्वेदी जी शर्मा जी जैन साहब अग्रवाल जी यादव जी जी सकते हैं तो फिर पाल प्रजापति सैनी कश्यप विश्वकर्मा बाल्मीकि कोरी सैन सविता नंद क्यों नहीं जीत सकते हमारा कहना है कि जब तक इन वंचित जातियों को जमात समझकर प्रत्याशी घोषित नहीं किए जाएंगे तब तक बहुजन मिशन केवल जाटव मिशन या व्यक्तिगत मिशन तो बन सकता है लेकिन बहुजन मिशन नहीं बन पाएगा खैर इस दौर में मेरे सम्पर्क में बड़े बड़े नेता समझे जाने वाले लोग रहें सभी अपने अपने जुगाड में मस्त और व्यस्त नज़र आए कुल मिलाकर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जब तक अतिपिछड़ों अतिदलितो को बहुजन मिशन का भला बड़ा हिस्सा नहीं माना जाएगा और आगे बढ़ रहें नेताओं का अतिपिछड़ी जातियों के प्रति दिल बड़ा नहीं होगा तब तक महापुरुषों का सपना और वंचितों का उत्थान धोखा खाता रहेगा। खैर चुनाव में 300 दिन शेष हैं और भाजपा को टक्कर देने वाले चार चार राज्यों से दस पांच हजार की भीड़ इकठ्ठा कर खुद को मुख्यमंत्री समझने लगे हैं बहन जी जहां प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से एक एक हजार लोग इकठ्ठा कर चार लाख जनता के सहारे सत्ता बनाने जा रही है वहीं अखिलेश जी बिना जन संख्या अनुपात में हिस्सेदारी दिए मुख्यमंत्री की शपथ लेते नज़र आ रहे हैं राहुल गांधी जहां अतिपिछड़ों अतिदलितो की हिस्सेदारी देने की घोषणा प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं कर पा रहे हैं वही भाजपा अपने इस प्रिय वोट को धार्मिक भावनाओं के साथ रोकने में मस्त हैं इन सभी के बाद सभी छोटे दल जहां बिना वोट के गठबंधन का रास्ता तलाश रहे हैं वही संघ अपनी सत्ता दिलाने की निष्ठा में दिन रात जुटा है आगे क्या होगा यह तो आने वाला समय बताएगा फिलहाल सभी दल अपनी अपनी जुगाड़बाजी में लगे हैं तो कोई किसी तरह से विधायक बनने का रास्ता तलाश रहा है।
विनेश ठाकुर सम्पादक विधान केसरी लखनऊ
