- कथित चिंतकों की चुप्पी वंचितों पर कुठाराघात
- आरक्षण के वर्गीकरण मांग भी है इनकी नौटंकी
लखनऊ। जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री विनेश ठाकुर ने सरकार द्वारा घोषित जाति-गणना की कॉलम सूची पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि जनगणना फॉर्म में पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों के लिए स्पष्ट कॉलम न होना केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर कुठाराघात है।
सभी दल एक थैली के चट्टे बट्टे
विधान केसरी के सम्पादक एवं जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनेश कर्पूरी ने कहा कि शर्म की बात यह है कि देश के सभी राजनीतिक दल अपनी जुगाड़बाजी में मस्त है और खुद सबसे बड़ा संविधान रक्षक होकर बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के सपनों का समाज बनाना का ढोंग करते हैं फर्जी यूजीसी रेगूलेशन पर नौटंकी करते घूम रहे हैं लेकिन जातिगत जनगणना कालम से ओबीसी ईबीसी का कालम गायब होने पर चुप्पी साधे हुए हैं क्योंकि दलित पिछड़ों में भी आरक्षण डकारने वाले अति दलितों और अतिपिछड़ों के दुश्मन है जिनसे सावधान रहने की आवश्यकता है ।
मुख्य आपत्तियाँ
योजनाओं में हिस्सेदारी का संकटरू विनेश ठाकुर ने स्पष्ट किया कि यदि इन वर्गों की सही गणना नहीं हुई, तो सरकारी योजनाओं और बजट का आवंटन जनसंख्या के वास्तविक अनुपात में नहीं हो पाएगा, जिससे ये वर्ग विकास की मुख्यधारा से पिछड़ जाएंगे।
संवैधानिक अधिकारों का हननरू संविधान की व्यवस्था के अनुसार, राज्य का कर्तव्य है कि वह पिछड़े वर्गों की स्थिति का आकलन करे। अलग कॉलम का अभाव इस संवैधानिक जिम्मेदारी से बचने जैसा है।
न्यायालय की शरणरू जन सेवा दल ने ऐलान किया है कि वह इस ष्त्रुटिपूर्णष् सूची के विरुद्ध चुप नहीं बैठेगा। संगठन जल्द ही इस मामले को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करेगा।
पदाधिकारियों की चेतावनी
प्रदेश अध्यक्ष अरविंद ठाकुर ने कहा, ष्बिना सही डेटा के सामाजिक न्याय की बातें बेमानी हैं। हम इस मुद्दे को सड़क से लेकर न्यायालय तक लड़ेंगे।ष्
पिछड़ा वर्ग प्रभारी उमेश नंदवंशी ने इसे पिछड़ों और वंचितों के हक पर डाका करार दिया।
संवैधानिक और तकनीकी पक्ष (आपकी जानकारी के लिए)
- यदि आप सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो ये तर्क आपके पक्ष को मजबूत करेंगे।
- अनुच्छेद 16(4)। यह राज्यों को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करने की शक्ति देता है, लेकिन इसके लिए श्पर्याप्त प्रतिनिधित्वश् का डेटा होना अनिवार्य है।
- इंद्रा साहनी केस (1992)। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि पिछड़ेपन का निर्धारण करने के लिए वैज्ञानिक डेटा की आवश्यकता होती है।
- रोहिणी आयोग की सिफारिशेंरू अति-पिछड़ों (म्ठब्) के उप-वर्गीकरण के लिए सटीक डेटा की मांग लम्बे समय चली आ रही है
वर्गीकरण पर चुप्पी भी खोलती है चिंतकों की पोल - सपा बसपा भाजपा कांग्रेस सुहेलदेव निषाद मल्लाह समाज पार्टी हो या अपना दल और आजाद समाज पार्टी अतिपिछड़ी और अतिदलित दलित जातियों के हितों की फर्जी बातें तो करती है और आरक्षण के वर्गीकरण का दावा भी किया जाता है लेकिन सरकार में शामिल रहकर या अपने दलों से जन संख्या अनुपात में टिकट वितरण न कर बता देते हैं कि हमारा मकसद अतिदलित अतिपिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाना नहीं बल्कि वोट लेकर सत्ता के द्वारा उत्पीड़न करना है लेकिन जन सेवा दल की योजना सभी अतिदलित और अतिपिछड़ी जातियों को जन संख्या अनुपात में टिकट वितरण कर सरकार बनाना और वर्गीकरण कर स्थाई समाधान करना है।
