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ऐतिहासिक लालबाग मैदान से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया बस्तर पंडुम का शुभारंभ! कहा- 'बस्तर में शांति लौट रही है'


छत्तीसगढ़ के बस्तर की धरती पर जनजातीय संस्कृति, परंपरा और विश्वास का भव्य संगम उस समय देखने को मिला, जब संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम का शुभारंभ जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया. इस अवसर पर बस्तर की सांस्कृतिक विरासत पूरे वैभव के साथ मंच पर उतरी. राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम की 12 पारंपरिक विधाओं का अवलोकन किया और बस्तर के पारंपरिक नृत्यों का आनंद लिया.

उन्होंने अबुझमाड़ क्षेत्र के मलखंभ प्रदर्शन को भी देखा और कलाकारों की प्रतिभा की सराहना की. आदिवासियों की 12 विधाओं में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, रीति-रिवाज, वाद्ययंत्र, शिल्पकला, पारंपरिक व्यंजन, जनजातीय वेशभूषा, चित्रकला, आंचलिक साहित्य, जनजातीय नाट्य, आभूषण, पेय पदार्थ और वन-औषधियां शामिल रहीं, जिनमें कुल 705 प्रतिभागियों ने सहभागिता निभाई.

अपने संबोधन की शुरुआत में पारंपरिक अभिवादन करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, 'जय जोहार, देवी दंतेश्वरी की जय, सियान-सजन के जोहार.बस्तर पंडुम में आकर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है और बस्तर उन्हें अपने घर जैसा महसूस होता है.'

उन्होंने बस्तर के वीरों को नमन करते हुए यहां की कला, संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों की सराहना की. राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध राज्य है, जहां जनजातीय समाज सामूहिक उत्सव की परंपरा को जीवंत रखता है.'

उन्होंने बस्तर पंडुम को ऋतु परिवर्तन से जुड़ा लोकपर्व बताया और कहा कि इस वर्ष 50 हजार से अधिक लोगों की सहभागिता इस आयोजन की व्यापक स्वीकृति को दर्शाती है. इस प्रयास के लिए उन्होंने राज्य सरकार की सराहना की. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अपने संबोधन में कहा कि चार दशकों तक हिंसा से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में अब शांति लौट रही है.

बड़ी संख्या में लोग आत्मसमर्पण कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जता रहे हैं. उन्होंने आत्मसमर्पण करने वालों का स्वागत करते हुए युवाओं से शिक्षा को अपनाने और मुख्यधारा में आगे बढ़ने का आह्वान किया. उन्होंने बस्तर की प्राकृतिक संपदाओं, पर्यटन संभावनाओं और होम-स्टे जैसे प्रयासों को रोजगार का मजबूत आधार बताया.

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के जीवन दर्शन का प्रतिबिंब है. उन्होंने कहा कि बस्तर सिर्फ जंगलों की धरती नहीं, बल्कि परंपराओं, संस्कारों और कला की धरती है.

मुख्यमंत्री ने बताया कि बीते वर्ष जहां 6 विधाएं थीं, वहीं इस वर्ष बस्तर पंडुम में 12 विधाओं को शामिल किया गया है. 54 हजार से अधिक कलाकारों ने पंजीयन कराया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि जहां पहले भय और माओवादी हिंसा का साया था, वहां अब भरोसे और विकास ने जगह ली है.

उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य तय समय-सीमा के भीतर प्रभावित क्षेत्रों को पूरी तरह मुख्यधारा से जोड़ना है. उन्होंने यह भी कहा कि अब बस्तर में गोलियों की आवाज नहीं, बल्कि स्कूल की घंटियां सुनाई दे रही हैं और पुनर्वास नीति से युवाओं को नई दिशा मिल रही है.

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