कैश कांड मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसदीय समिति के सामने अपना जवाब दाखिल किया है। उन्होंने अपने बचाव में कई तर्क रखा है। जस्टिस वर्मा ने सवाल उठाया है कि यदि क्राइम सीन को सुरक्षित रखने में सरकारी अधिकारी विफल रहे, तो उन्हें महाभियोग का सामना क्यों करना चाहिए?
- सूत्रों के मुताबिक जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के सामने अपने जवाब में ये बातें कहीवह घटना स्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले व्यक्ति नहीं थे।
- जब पुलिस मौके को सुरक्षित करने में नाकाम रही, तो उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
- आग लगने की घटनाओं में जिस तरह की कार्रवाई अपेक्षित होती है, पुलिस को वैसी कार्रवाई करनी चाहिए थी।
- मौके पर मौजूद पुलिस ने स्थल को सील नहीं किया।
- पुलिस और फायर ब्रिगेड, दोनों ही मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने आवश्यक कार्रवाई नहीं की।
- घटनास्थल से किसी तरह की कोई बरामदगी नहीं हुई।
- अब यह कहा जा रहा है कि वहां से नकदी बरामद हुई।
- जब वह स्वयं मौके पर मौजूद नहीं थे और न ही फर्स्ट रिस्पोंडेंट थे, तो उस जगह को सुरक्षित न करने के लिए उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
- उस समय स्थल उन लोगों के नियंत्रण में था जो वहां मौजूद थे, जस्टिस वर्मा मौके पर उपस्थित नहीं थे।
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट (पूर्व में दिल्ली हाईकोर्ट) के जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा है। यह मामला मार्च 2025 में तब सुर्खियों में आया जब उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर लगी आग के बाद भारी मात्रा में कैश बरामद होने की खबरें आईं। 14 मार्च 2025 को तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास के एक स्टोर रूम में आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए पहुंचे फायर ब्रिगेड और पुलिस को वहां फर्श पर 500 रुपये के नोटों के जले और अधजले बंडल मिले।
तत्कालीन चीफ जस्टिस (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले की जांच के लिए तीन जजों की एक इन-हाउस कमेटी बनाई। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया था। जुलाई 2025 में लोकसभा के 140 से अधिक सांसदों ने उन्हें पद से हटाने (महाभियोग) के लिए नोटिस दिया। अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय संसदीय समिति का गठन किया। जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के गठन की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
