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आगराः छावनी में ठेल-ढकेल हटाए जाने से चार परिवारों का रोजगार छिना, दो महीने से संकट में जीवन


आगरा। सदर स्थित छावनी क्षेत्र में पिछले करीब बीस वर्षों से ठेल-ढकेल लगाकर जीवन यापन कर रहे चार व्यापारियों का रोजगार छावनी विभाग द्वारा हटाए जाने के बाद छिन गया है। पीड़ित व्यापारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों से उनके घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है और परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच चुका है।

सदर की प्रसिद्ध चाट गली में ये व्यापारी लंबे समय से ठेल-ढकेल लगाकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। छावनी प्रशासन द्वारा अचानक चार ठेल हटाकर छावनी की सुंदरता का हवाला दिया गया, जिससे ये परिवार बेरोजगार हो गए। पीड़ितों ने स्थानीय विधायक समेत कई जिम्मेदार लोगों से मुलाकात की, लेकिन कहीं से भी उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।

छावनी के सीईओ दीपक कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि संबंधित भूमि छावनी की है और बिना अनुमति के किसी को भी ठेल-ढकेल लगाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि ये लोग आए दिन आपस में मारपीट और एक-दूसरे की शिकायत करते थे, जिससे प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी।

हालांकि बड़ा सवाल यह है कि छावनी क्षेत्र में पिछले दो वर्षों में दर्जनों ठेल-ढकेल और रेडी-पटरी वाले लोग खुलेआम रोजगार कर रहे हैं। ऐसे में क्या उन सभी को भी हटाया जाएगा? क्या उन सभी के पास छावनी की अनुमति है? यदि अनुमति अनिवार्य है तो केवल इन्हीं चार व्यापारियों पर कार्रवाई क्यों की गई?

पीड़ितों का आरोप है कि न तो किसी थाने या चैकी में इनके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज है और न ही किसी एसोसिएशन के पास शिकायत की कोई प्रति मौजूद है। फिर किस आधार पर कार्रवाई की गई, यह आज भी सवाल बना हुआ है। यह भी सवाल उठ रहा है कि जिन लोगों ने कथित रूप से शिकायत की, उन्हें या पीड़ितों को कोई नोटिस क्यों नहीं दिया गया।

सदर एसोसिएशन के अध्यक्ष ने बताया कि 5 जनवरी को होने वाली छावनी बोर्ड की बैठक में इस मुद्दे को उठाया जाएगा और पीड़ित व्यापारियों की मदद के लिए प्रयास किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि आपसी शिकायतों के चलते यह स्थिति बनी, लेकिन इसके कोई लिखित प्रमाण सामने नहीं आए हैं।

पीड़ित व्यापारियों के परिजन पिछले दो महीनों से अपने रोजगार को दोबारा शुरू कराने के लिए सीईओ कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन न तो उनसे मुलाकात हो पा रही है और न ही कोई स्पष्ट जानकारी दी जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन परिवारों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कौन लेगा? अगर रोजगार छिनने से किसी पीड़ित व्यापारी के साथ कोई अनहोनी होती है, तो उसके परिवार के साथ कौन खड़ा होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इनके रोजगार को उजाड़ने के पीछे कोई बड़ी राजनीति, साजिश या आर्थिक लाभ की मंशा छिपी हो?

अब निगाहें 5 जनवरी को होने वाली छावनी बोर्ड की बैठक पर टिकी हैं, जहां से इन पीड़ित परिवारों को न्याय और राहत की उम्मीद है।


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