श्रीनिवास त्रिपाठी
बाराबंकी। सावन का महीना आते ही उत्तर भारत की पवित्र भूमि पर शिवभक्ति की गूंज हर दिशा में सुनाई देने लगती है। इसी भक्ति भाव के को लेकर हम आपको ले चलते हैं एक ऐसे दिव्य तीर्थ की ओर, जो न सिर्फ अपनी पौराणिकता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि जहां शिव स्वयं एक किसान के सपने में प्रकट हुए थे । लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले का लोधेश्वर महादेव मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि यह उस श्रद्धा की कहानी भी है जिसमें एक ग्रामीण ने ईश्वर की पुकार को पहचानकर इतिहास रच दिया।कहानी महाभारत काल से पहले की है। गांव के एक सरल, विद्वान और निःसंतान ब्राह्मण लोधेराम अवस्थी को एक रात स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए। अगले दिन खेत में सिंचाई करते वक्त उन्होंने एक गड्ढा देखा, जिसमें पानी जाकर रहस्यमय ढंग से गायब हो रहा था। उन्होंने उस गड्ढे को बंद करने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे।रात में फिर से स्वप्न में भगवान ने प्रकट होकर संकेत दिया जिस स्थान पर पानी जा रहा है, वहीं मेरा वास है, मुझे वहीं स्थापित करो। इस स्थान से तुम प्रसिद्धि पाओगे। जब लोधेराम ने गड्ढे की खुदाई शुरू की, तो उनका औजार किसी कठोर वस्तु से टकराया। यह वही शिवलिंग था जिसे उन्होंने स्वप्न में देखा था। कहा जाता है कि जहां औजार लगा था, वहां से रक्तस्राव हुआ और वह निशान आज भी शिवलिंग पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।लोधेश्वर महादेव केवल एक मंदिर नहीं, एक जीवित चमत्कार है जहां आस्था, इतिहास और अध्यात्म एक साथ धड़कते हैं। यह वह स्थान है जहां एक किसान के विश्वास ने सपने को साकार किया, और पृथ्वी पर भगवान शिव ने अपना दिव्य निवास बना लिया।
शिवलिंग के आसपास की खुदाई करते-करते भी लोधेराम उसकी गहराई तक नहीं पहुंच पाए, तब उन्होंने वहीं मंदिर बनवाया। भगवान शिव और लोधेराम के नाम को जोड़कर इस तीर्थ को नाम मिला लोधेश्वर महादेव। इसके बाद उन्हें चार पुत्रों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, जिनके नाम पर आसपास के गांव महादेवा, लोधौरा, गोबरहा और राजनापुर आज भी मौजूद हैं।
महाभारत के कई प्रसंगों में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। युद्ध के बाद पांडवों ने यहीं पर महायज्ञ का आयोजन किया था। आज भी यहां स्थित पांडव कूप को दिव्य माना जाता है और इसकी जलधारा को रोग निवारक बताया गया है।
सावन के महीने में लोधेश्वर धाम पर भक्ति का समुद्र उमड़ता है। खासकर सोमवार के दिन शिवभक्तों की इतनी भीड़ होती है कि 8 से 10 घंटे तक लंबी कतार में खड़े रहकर लोग केवल एक झलक पाने को लालायित रहते हैं। मान्यता है कि यहां केवल एक लोटा जल चढ़ाने मात्र से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं।
हर साल सावन में लाखों शिवभक्त कांधे पर कांवड़ लेकर गंगा जल लाते हैं और बाबा लोधेश्वर का अभिषेक करते हैं। यह भीड़ इतनी अधिक होती है कि प्रशासन को हाईवे तक डायवर्ट करना पड़ता है, जबकि कुछ मार्गों को पूरी तरह से बंद करना पड़ता है।
यहां साल में चार भव्य मेले लगते हैं फाल्गुनी, अगहनी, सावन और कजरी तीज। हर तीसरे साल पुरुषोत्तम मास का विशेष मेला भी लगता है। इन मेलों में उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि देशभर से श्रद्धालु जुटते हैं।
