चौधरी मुकेश सिंह
लखनऊ । दुधवा नेशनल पार्क सघन और जैव विविधता से परिपूर्ण संरक्षित वन क्षेत्र है।प्रकृति की गोद में एक रोमांचक यात्रा हर वर्ष दुधवा नेशनल पार्क सर्दियों में 15 नवंबर से शुरू होकर गर्मियों में 15 जून पर बंद होता है। उत्तर प्रदेश राज्य मे स्थित दुधवा नेशनल पार्क वन्य जीव प्रेमियो पर्यटकों और फोटोग्राफरों एवं रिसर्च करने वाले छात्रों के लिए अद्भुत स्थल है। यह उद्यान लखीमपुर खीरी जिले के पलिया शहर से करीब 10 किलोमीटर दूरी पर भारत नेपाल सीमा पर स्थित है। और इसकी सीमाएं तराई की जंगल से लगी हुई है यह स्थान अपनी जैव विविधता दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियां और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। जहां प्रकृति की गोद में यह उद्यान वन्य जीव प्रेमियों और प्रकृति के प्रशंसकों के लिए स्वर्ग के समान है। यहां पर समय बिताना एक स्मरणीय अनुभव बन जाता है।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना सन 1977 में की गई थी और उसके बाद सन 1987 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर के तहत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया , अगर हम इस वन क्षेत्र की बात करें तो करीब 1284 वर्ग किलोमीटर में इसकी प्राकृतिक छटा फैली हुई है। यहां मुख्यतः दलदली मैदान बड़ी-बड़ी घास के साथ-साथ साल के बड़े-बड़े वृक्षो से यह परिपूर्ण है , जो इसे अन्य राष्ट्रीय उद्यानों से अलग बनाती है ।इसमें किशनपुर और कर्तनीया घाट अभ्यारण भी शामिल है।
यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग एवं वायु मार्ग दोनों ही सुविधा उपलब्ध है। यह सड़क मार्ग लखनऊ से करीब 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यहां पर सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। क्योंकि अब रास्ते बहुत ही सुगम और व्यवस्थित हो जाने से सीतापुर ,लखीमपुर, बिजुआ ,भीरा होते हुए पलिया कला के बाद सीधे दुधवा आसानी से पहुंचा जा सकता है।क्योंकि रास्ते अच्छे होने के साथ-साथ इस रूट पर पहले तीन रेलवे लाइन की क्रॉसिंग पड़ती थी। जिन पर अक्सर ट्रेन आने से रास्ते बंद मिलते थे, लेकिन अब उनके ऊपर ऊपरगामी सेतु बन जाने से यह रास्ता और भी सुगम हो गया है। यहां आने के लिए अब वायु मार्ग से लखनऊ हवाई अड्डे से पलिया के लिए सीधी उड़ान सेवा स्थापित हो चुकी है। यहां घूमने के लिए वन्यजीवों को करीब से देखने के लिए जिप्सी सफारी के साथ-साथ एलिफेंट सफारी भी मौजूद है । इनसे जंगल भ्रमण कर एक रोमांचक अनुभव होता है। हमें बहुत ही नजदीक से वन्यजीवों के साथ-साथ प्राकृतिक छटा देखने को मिलती है। जैसे टाइगर बाघ, तेंदुआ , गेंडा , हाथी हिरण, बारहसिंगा ,जंगली ,सूअर, लंगूर, सियार, भालू , नीलगाय इत्यादि वन्य जीव देखने को मिलते हैं। स्थानीय गाइड के साथ जंगल का भ्रमण करना एक रोमांचक अनुभव होता है।
दुधवा नेशनल पार्क का मुख्य आकर्षण यहां पर पाई जाने वाली वाली स्वंप डियर (बारहसिंगा )उत्तर भारत में केवल दुधवा में ही पाया जाता है । इसके संरक्षण मे उद्यान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां पर बार्किंग डियर भी बहुतायत में पाया जाता है । यहां पर सन 1984 85 में गैंडा पुनर्वास कार्यक्रम वन विभाग के द्वारा बहुत ही जोर शोर से शुरू किया गया था। उसमें बहुतायत में सफलता भी मिली है।यह गेंडा आसाम नेपाल से लाकर इनको एक बाड़े में रखा गया था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती चली गई और आज लगभग 46 गेंडा है। जिसमें से कुछ को जंगल में स्वच्छंद विचरण हेतु छोड़ा गया है। जंगल में भ्रमण करते हुए आपकी सफारी के सामने देखने को मिल सकता हैं ।
पक्षी प्रेमियों के लिए भी स्वर्ग से कम नहीं है दुधवा की आओ पक्षियों की चहचहाट वन्य जीवों की हरकतें पर्यटकों को मंत्र मुग्ध कर देती हैं।
दुधवा जंगल के पक्षी प्रेमियों के लिए यहां लगभग 400 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं । जिसमे सारस क्रेन, हॉर्नबिल, उल्लू ,गिद्ध , चील, और रंग-बिरंगे अन्य प्रवासी एवं स्थाई पक्षी भी शामिल है। यहां पहुंचने पर दुधवा नेशनल पार्क के द्वारा संचालित विश्राम गृहों के अलावा बहुत सारे प्राइवेट रिजॉर्ट्स हैं। जिसमें ठहरने की सुविधा उपलब्ध है । कैंटीन की व्यवस्था कैंपस में ही है जहां पर पर्यटक आराम से रहते हुए खाना भी खा सकता है। जंगल सफारी के लिए समय निर्धारित है। जंगल सफारी और एलिफेंट सफारी सुबह 7रू00 बजे से 10रू00 बजे तक और दूसरी शाम 3रू00 से 6रू00 बजे तक होती है । जो रजिस्ट्रेशन के बाद ही शुरू होती है । हाल में ही रेलवे के द्वारा विसकोडेम कोच की शुरुआत की गई थी जो पर्यटकों की को खूब लुभा रही हैं ।
जिसका टिकट मात्रा रुपया 275 है सत्र 2024 25 के सीजन में यहां पर स्वदेशी पर्यटकों की संख्या लगभग 64500 के करीब रही है । इसमें करीब 352 पर्यटक विदेश से भी15 दुधवा भ्रमण पर आए । दुधवा राष्ट्रीय उद्यान एक लोकप्रिय इको टूरिज्म का प्रमुख प्राकृतिक स्थल बन चुका है ।
दुधवा जंगल की सीमा से लगा हुआ चंदन चैकी है यहां थारू जनजाति बहुतायत में जंगल के किनारे किनारे बसी है। यहां के निवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए सरकारों द्वारा होमस्टे ,हस्तशिल्प, और संस्कृति अनुभव को भी बढ़ाया दिया जा रहा है ।
आगामी नवंबर माह में दुधवा फेस्टिवल का भी आयोजन किया जाएगा जिसमें सांस्कृतिक ,संगीत, और वन्य जीव पर गतिविधियां आयोजित होंगी।
सुबह शाम में जीप व हाथी सफारी के साथ ही विशटोडैम कोच में यात्रा करना ना भूले। थारू परिवारों में होम स्टे एवं संस्कृतिक अनुभव का आनंद जरूर लें।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान का भ्रमण केवल एक यात्रा ही नहीं , बल्कि प्रकृति से सीधा संवाद का माध्यम है। यहां पर आकर जो अनुभव हमें वन्य जीवों के करीब लाता है , बल्कि यह भी सिखाता है कि जैव विविधता और पर्यावरण का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है।
अगर पर्यटक सच्चे अर्थों में रोमांच और प्रकृति की शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो दुधवा भ्रमण पर आगामी सत्र 2025 26 में जरूर आना चाहिए। आप यूपी इको टूरिज्म की साइट पर जाकर ऑनलाइनबुकिंग कर सकते हैं। नई सरकारी पहल से आगामी सत्र में पर्यटकों की संख्या में वृद्धि की की संभावना है।
विगत अप्रैल 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुधवा को एक इको टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की पहल की जिसकी सभी योजनाएं 12 जून 2025 तक पूरी करने का निर्देश दिए गए हैं ।
स्थानीय थारू महिलाओं के स्वयं सहायता समूह एवं नाबार्ड के द्वारा समिति भी बनाई गई है। व्यावसायिक प्रदर्शनी और पार्क में मानव वन्य जीव संघर्ष को कम करने के आधुनिक उपायों की शुरुआत की गई।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना सन 1977 में की गई थी और उसके बाद सन 1987 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर के तहत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया , अगर हम इस वन क्षेत्र की बात करें तो करीब 1284 वर्ग किलोमीटर में इसकी प्राकृतिक छटा फैली हुई है। यहां मुख्यतः दलदली मैदान बड़ी-बड़ी घास के साथ-साथ साल के बड़े-बड़े वृक्षो से यह परिपूर्ण है , जो इसे अन्य राष्ट्रीय उद्यानों से अलग बनाती है ।इसमें किशनपुर और कर्तनीया घाट अभ्यारण भी शामिल है।
यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग एवं वायु मार्ग दोनों ही सुविधा उपलब्ध है। यह सड़क मार्ग लखनऊ से करीब 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यहां पर सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। क्योंकि अब रास्ते बहुत ही सुगम और व्यवस्थित हो जाने से सीतापुर ,लखीमपुर, बिजुआ ,भीरा होते हुए पलिया कला के बाद सीधे दुधवा आसानी से पहुंचा जा सकता है।क्योंकि रास्ते अच्छे होने के साथ-साथ इस रूट पर पहले तीन रेलवे लाइन की क्रॉसिंग पड़ती थी। जिन पर अक्सर ट्रेन आने से रास्ते बंद मिलते थे, लेकिन अब उनके ऊपर ऊपरगामी सेतु बन जाने से यह रास्ता और भी सुगम हो गया है। यहां आने के लिए अब वायु मार्ग से लखनऊ हवाई अड्डे से पलिया के लिए सीधी उड़ान सेवा स्थापित हो चुकी है। यहां घूमने के लिए वन्यजीवों को करीब से देखने के लिए जिप्सी सफारी के साथ-साथ एलिफेंट सफारी भी मौजूद है । इनसे जंगल भ्रमण कर एक रोमांचक अनुभव होता है। हमें बहुत ही नजदीक से वन्यजीवों के साथ-साथ प्राकृतिक छटा देखने को मिलती है। जैसे टाइगर बाघ, तेंदुआ , गेंडा , हाथी हिरण, बारहसिंगा ,जंगली ,सूअर, लंगूर, सियार, भालू , नीलगाय इत्यादि वन्य जीव देखने को मिलते हैं। स्थानीय गाइड के साथ जंगल का भ्रमण करना एक रोमांचक अनुभव होता है।
दुधवा नेशनल पार्क का मुख्य आकर्षण यहां पर पाई जाने वाली वाली स्वंप डियर (बारहसिंगा )उत्तर भारत में केवल दुधवा में ही पाया जाता है । इसके संरक्षण मे उद्यान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां पर बार्किंग डियर भी बहुतायत में पाया जाता है । यहां पर सन 1984 85 में गैंडा पुनर्वास कार्यक्रम वन विभाग के द्वारा बहुत ही जोर शोर से शुरू किया गया था। उसमें बहुतायत में सफलता भी मिली है।यह गेंडा आसाम नेपाल से लाकर इनको एक बाड़े में रखा गया था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती चली गई और आज लगभग 46 गेंडा है। जिसमें से कुछ को जंगल में स्वच्छंद विचरण हेतु छोड़ा गया है। जंगल में भ्रमण करते हुए आपकी सफारी के सामने देखने को मिल सकता हैं ।
पक्षी प्रेमियों के लिए भी स्वर्ग से कम नहीं है दुधवा की आओ पक्षियों की चहचहाट वन्य जीवों की हरकतें पर्यटकों को मंत्र मुग्ध कर देती हैं।
दुधवा जंगल के पक्षी प्रेमियों के लिए यहां लगभग 400 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं । जिसमे सारस क्रेन, हॉर्नबिल, उल्लू ,गिद्ध , चील, और रंग-बिरंगे अन्य प्रवासी एवं स्थाई पक्षी भी शामिल है। यहां पहुंचने पर दुधवा नेशनल पार्क के द्वारा संचालित विश्राम गृहों के अलावा बहुत सारे प्राइवेट रिजॉर्ट्स हैं। जिसमें ठहरने की सुविधा उपलब्ध है । कैंटीन की व्यवस्था कैंपस में ही है जहां पर पर्यटक आराम से रहते हुए खाना भी खा सकता है। जंगल सफारी के लिए समय निर्धारित है। जंगल सफारी और एलिफेंट सफारी सुबह 7रू00 बजे से 10रू00 बजे तक और दूसरी शाम 3रू00 से 6रू00 बजे तक होती है । जो रजिस्ट्रेशन के बाद ही शुरू होती है । हाल में ही रेलवे के द्वारा विसकोडेम कोच की शुरुआत की गई थी जो पर्यटकों की को खूब लुभा रही हैं ।
जिसका टिकट मात्रा रुपया 275 है सत्र 2024 25 के सीजन में यहां पर स्वदेशी पर्यटकों की संख्या लगभग 64500 के करीब रही है । इसमें करीब 352 पर्यटक विदेश से भी15 दुधवा भ्रमण पर आए । दुधवा राष्ट्रीय उद्यान एक लोकप्रिय इको टूरिज्म का प्रमुख प्राकृतिक स्थल बन चुका है ।
दुधवा जंगल की सीमा से लगा हुआ चंदन चैकी है यहां थारू जनजाति बहुतायत में जंगल के किनारे किनारे बसी है। यहां के निवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए सरकारों द्वारा होमस्टे ,हस्तशिल्प, और संस्कृति अनुभव को भी बढ़ाया दिया जा रहा है ।
आगामी नवंबर माह में दुधवा फेस्टिवल का भी आयोजन किया जाएगा जिसमें सांस्कृतिक ,संगीत, और वन्य जीव पर गतिविधियां आयोजित होंगी।
सुबह शाम में जीप व हाथी सफारी के साथ ही विशटोडैम कोच में यात्रा करना ना भूले। थारू परिवारों में होम स्टे एवं संस्कृतिक अनुभव का आनंद जरूर लें।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान का भ्रमण केवल एक यात्रा ही नहीं , बल्कि प्रकृति से सीधा संवाद का माध्यम है। यहां पर आकर जो अनुभव हमें वन्य जीवों के करीब लाता है , बल्कि यह भी सिखाता है कि जैव विविधता और पर्यावरण का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है।
अगर पर्यटक सच्चे अर्थों में रोमांच और प्रकृति की शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो दुधवा भ्रमण पर आगामी सत्र 2025 26 में जरूर आना चाहिए। आप यूपी इको टूरिज्म की साइट पर जाकर ऑनलाइनबुकिंग कर सकते हैं। नई सरकारी पहल से आगामी सत्र में पर्यटकों की संख्या में वृद्धि की की संभावना है।
विगत अप्रैल 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुधवा को एक इको टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की पहल की जिसकी सभी योजनाएं 12 जून 2025 तक पूरी करने का निर्देश दिए गए हैं ।
स्थानीय थारू महिलाओं के स्वयं सहायता समूह एवं नाबार्ड के द्वारा समिति भी बनाई गई है। व्यावसायिक प्रदर्शनी और पार्क में मानव वन्य जीव संघर्ष को कम करने के आधुनिक उपायों की शुरुआत की गई।
