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देश के अति पिछड़े कृपया ध्यान दें आपको हिस्सेदारी देने के सभी दरवाजे बंद हैं ?


देशभर के अति पिछड़े भले ही किसी न किसी दल को अपना मानकर चलने में संकोच न करते हो और देश के तमाम राजनीतिक दल भले ही इनके लिए कितने भी हमदर्द होने का दावा करते रहे लेकिन आजादी के बाद से अब तक के राजनीतिक इतिहास पर या शासक बनने के इतिहास पर नजर डालें तो किसी दल की नीति व नीयत अतिपिछड़ों के लिए साफ नहीं दिखाई देगी जिस पर अति पिछड़ी जातियों को विचार करने की आवश्यकता है ।




हालांकि ऐसा नहीं है की राजनीतिक दल और सरकार ध्यान न देती हो लेकिन वोट के समय ओबीसी कहकर पिछड़ों में आने वाली ताकत वर जातियों को अतिपिछड़ी जातियों का भी हिस्सा दे दिया जाता है और जहां नहीं दिया जाता वहां पिछड़े वर्ग की बाहुबली जाति इन राजनैतिक दलों से न सिर्फ अपना बल्कि अतिपिछड़ी जातियों का हिस्सा भी छीनकर डकार जाति है लेकिन सभी दलों में अपमान झेलने के बावजूद अपने चक्कर में लगे अतिपिछड़ी जातियों के नेता कभी खुलकर अपनी जाति का जनसंख्या अनुपात में हिस्सा नहीं मांग पाते हैं जिस कारण भले ही पाल प्रजापति सैनी कश्यप विश्वकर्मा सैन सविता नंद समाज के एक या दो विधायक एम एल सी बन जातें हो लेकिन जनसंख्या अनुपात में विधायक सांसद नहीं बन पाते हैं जबकि देश में ऐसी भी जातियां हैं जो अपनी वोट संख्या से दस गुना से अधिक विधायक सांसद मंत्री बनाने में कामयाब रहती है जिस पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री रहे हों या उनकी पार्टी के अध्यक्ष किसी ने हिस्सेदारी देने का साहस नहीं किया यही कारण रहा कि अतिपिछड़ी जातियों में शैक्षणिक योग्यता आते ही हिस्सेदारी का दावा करना शुरू कर दिया है हालांकि चालाक राजनीतिक दल जानते हैं चालिस प्रतिशत वोट रखने वाली जातियों के यदि चालिस प्रतिशत विधायक सांसद बन गए तो फिर वर्तमान राजनीतिक दलों को सत्ता से उखाड़ा जा सकता है और वापसी सम्भव नहीं है यही कारण है कि आज देश भर हर कोई अतिपिछड़ा अपनी पार्टी बनाकर सत्ता हासिल करने का सपना देखने लगा है जिस कारण मैं तो दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी राजनीतिक दल अतिपिछड़ों के प्रति निति और नियत साफ नहीं है जिस कारण कहना गलत नहीं होगा कि अतिपिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के इन राजनैतिक दलों के सभी दरवाजे बंद है।

विनेश ठाकुर ,सम्पादक

विधान केसरी, लखनऊ

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