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हां मैं समाज का गद्दार हूं लेकिन देशद्रोही नहीं


  • बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है।
  • इस लेख में कई उल्लू के नाम दिए गए हैं।
  • चुनाव से पहले हिंदू, और चुनाव बाद बुंडू
  • सच्चाई उजागर करता आज का सम्पादकीय।
  • चारों ओर मचाओ शोर, वंचित चला सत्ता की ओर।
  • समाज को गुमराह करने के आरोपी कथित समाज सेवकों से सावधान रहें अति पिछड़े वर्ग लोग - विनेश भईया

जैसे जैसे देश भर में सबसे ज्यादा मतदाता संख्या रखने वाला अतिपिछड़ा वर्ग सत्ता की भूख और अपनी मतदाता हैसियत तथा सनातनी व्यवस्था में खुद को अपमानित महसूस करके सत्ता की ओर दौड़ने लगा है वैसे ही देश में सर्वाधिक समय राज करने वाली कांग्रेस भाजपा हो या राज्यों में इनके वोटों के सहारे सत्ता की मलाई चाट चुकी राज्य स्तरीय पार्टियां सभी ने फिर से अतिपिछड़ों को अपना भाई बताकर इन्हें साधने का प्रयास शुरू कर दिया है जिसे आजकल अखबारों व अन्य शोशल मिडिया प्लेट फार्म पर आसानी से देखा व पढ़ा जा सकता है।

बीते दिनों से राहुल गांधी सहित कई कथित ओबीसी चिंतकों के विडियो वायरल हो रहें है जो दलित पिछड़ों की वकालत कर रहे हैं। मजेदार बात तो यह है कि खुद को ओबीसी बताकर धर्म के ठेकेदार बनी भाजपा एक नहीं कई बार ओबीसी विरोधी चेहरा दिखा चुकी है और खुद को ओबीसी बताने वाले अखिलेश यादव हो या अतिपिछड़ों के नाम पर सत्ता का स्वाद चखने वाले छुटभैय्ए राजनीतिक दल कोई पीडीए के नाम पर तो कोई सामाजिक, जातिगत व्यवस्था का विरोध करके तो कोई क्रीमी लेयर को अलग कर अपना उल्लू सीधा करने में जुट गया है जबकि अतिपिछड़ों के असली दुश्मन ही ओबीसी में आने वाली वो बाहुबली कौम जो इस चालिस प्रतिशत अतिपिछड़े को चुनाव आते ही हिंदू हिंदू भाई भाई, मेरा भाई तेरा,अपना भाई मानने में संकोच नहीं करते हैं और चुनाव परिणाम आते ही इनका प्रत्येक स्तर पर उत्पीड़न करने में संकोच नहीं करते।

जो मैं पूछना चाहता हूं सपा बसपा कांग्रेस भाजपा सहित देश प्रदेश में झूठ की सियासत पर अतिपिछड़ों के साथ न्याय का ढोंग करने वाले बड़े बड़े राजनेताओं से कि भईया अब जमाना उस समय का नहीं जब अतिपिछड़ों को या यूं कहें कि वर्ण-व्यवस्था के अनुसार इन्हें अपना गुलाम समझकर सत्ता का मजा लिया जाता था अब जमाना राम रामायण या धर्म अधर्म का भी नहीं अब जमाना ईश्वर अल्लाह भगवान का भी नहीं अब जमाना शिक्षा संविधान और विज्ञान का है तथा अब सनातनी व्यवस्था को अपने अंधविश्वास से चार चांद लगाने वाले अतिपिछड़ों द्वारा केदारनाथ बद्रीनाथ वैश्णो देवी मनसा देवी चंडी देवी सहित तमाम देवताओं के नाम पर वोट हासिल करने का नहीं बल्कि विधान सभा लोकसभा को दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर मानकर धन धरती शिक्षा सम्मान हासिल करने का है वह जानतें हैं कि धर्म हमारा निजी विषय है इसमें हमें किसी दल या सरकार के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है और सत्ता इसका रास्ता केवल और केवल सत्ता से होकर गुजरता है जिसमें सभी दुखों की दवाई मिलती है क्योंकि धर्म अधर्म हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई पारसी व्यवस्था को अब अतिपिछड़ों द्वारा तेजी से हवा में तीर चलाने या वायदा दावा करने का नहीं, डू एंड डन का बन गया है यानी जो करना है करो अब वायदा करना फिर वायदा खिलाफी झेलना बस से बाहर है,

अब दो तीन प्रतिशत वोट रखने वाली सैकड़ों उपजातियों जैसे नाई पाल प्रजापति सैनी शाक्य कुशवाहा मौर्य कश्यप लुहार सुनार सहित दर्जनों जातियों को शिक्षित होने के कारण अपने वोट की ताकत का पता चल चुका है इन्हें पता चल चुका है कि हम जातियों में बटे अतिपिछड़े एक दो तीन चार नहीं बल्कि चालिस प्रतिशत वोट हैं किसी विधान सभा क्षेत्र में डेढ़ दो लाख होते हैं अब ये इन्हें यह भी पता है कि सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करते समय या यूं कहें कि भेदभाव रखने वालों ने देश की नव्वे प्रतिशत जनता को सेवा में लगाएं रखने की साजिश रची गई थी केवल एस सी ओबीसी ही नहीं सभी समझ चुकें हैं इतना ही नहीं अब अतिपिछड़ा वर्ग यह भी समझ चुका है कि हमें सरकार द्वारा पुस्तैनी धंधों में लगाने के षडयंत्र में यदि सरकार प्रत्येक व्यक्ति को करोड़ों रुपए बांट भी दें तो हम अब षडयंत्र में आने वाले नहीं हैं तभी तो अधिकारों से वंचित कर भगवान का मंदिर बनाने वालों को बता दिया कि भाई अब हमें बेवकूफ या लकीर के फकीर समझना बंद करों अब हम छात्रवृत्ति, अधिकार ,रोजी रोटी रोजगार मान सम्मान आरक्षण मांगने वाले नहीं बल्कि अपने वोट के बल पर उक्त सभी मांगे पूरी करने वाले बनना चाहते हैं और तुम्हारे कहने सुनने या बरगलाने में आने वाले नहीं हैं।


अब हमें पांच किलो राशन नहीं अब हम अपने लोगों को भिखारी प्रवृति से निकाल कर शिकारी बनाने और बनने की तरफ मोड़ रहे हैं इसी से चिंतित चाहें अतिपिछड़ों को शूद्र समझने वाला संघ हों या चुनाव के समय अपना भाई मानने वाली सपा बसपा अथवा आजादी के बाद से अब तक बर्बाद करने वाली कांग्रेस सभी ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में चालिस प्रतिशत अतिपिछड़े इक्कीस प्रतिशत अनूसूचित और पंद्रह प्रतिशत अल्पसंख्यक को दस प्रतिशत लोगों ने अपने साथ टिकाए रखने के मिशन पर काम करना शुरू कर दिया मजेदार बात यह कि इन्हें यह भी पता है कि हम इस नव्वे प्रतिशत आबादी को सत्ता की तरफ दौड़ने से रोक तो नहीं सकते ,लेकिन इनसे जातिगत सामाजिक व्यवस्था में सुधार को लेकर सनातनी व्यवस्था का मजबूत पक्ष रखकर सनातनी व्यवस्था के विरुद्ध भड़काया तो जा सकता है ताकि ये पाखंडवाद से मुक्ति के लिए सामाजिक जातिगत एवं महापुरुष को भारत रत्न या अन्य तरह से उनके नामकरण की मांग रखवाकर फिर अपनी सरकार बनाकर अतिपिछड़ों को एक रणनीति में प्रत्येक वर्ष कर्पूरी जयंती डा अम्बेडकर जयंती पुण्य तिथि, रविदास जयंती मनाने में उलझकर हजारों करोड़ चंदा खर्चते रहे और हम वोट व नोट भी कम खर्च करके सत्ता हासिल कर इनके अधिकारों पर डांका डालते रहे। चलिए यह इन वंचितों को जूते खाकर ही सही जल्दी समझ आ जाएगा लेकिन यह सोलह आने सच है कि अब इन्हें अपनी बर्बादी का कारण तो पता चल चुका है लेकिन बर्बाद करने वाले अतिपिछड़ों को यह शासन सत्ता नहीं पुस्तैनी धंधों को मजबूती प्रदान कर वोट की ठगाई करने में जुट गए हैं जिसे अल्पसंख्यक दलित समझें न समझे चालिस प्रतिशत अतिपिछड़े पूरी तरह समझ चुकें हैं इस लिए यह चैबीस लोकसभा चुनाव में बैशाखियों पर आ गए और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के चुनाव में इन्हें टिकटिकी भी मिलने वाली नहीं है।


इनसे कोई पूछे कि हमारी अब तक बरबादी की बुनियाद भी तुम्हारे और हमारे समाज के ही कुछ कथित समाज सेवकों द्वारा रखी गई थी,लेकिन वर्तमान सरकार ने तो ध्वस्त कर दिया और तुम्हें अब याद आई जब तेजी से सत्ता की ओर दौड़ रही वंचित जातियों ने होश सम्हालना शुरू किया तो सभी को दलित पिछड़ों की याद आने लगी लेकिन गुलामी और धर्मांधता तथा जाति छुपाने में मस्त अपने समाज के मठाधीश आज भी शर्म महसूस नहीं कर रहे हैं। सैन सविता नंद सैनी शाक्य कुशवाहा मौर्य कश्यप लुहार सुनार पाल प्रजापति आदि जातियों के जनप्रतिनिधि जहां सामाजिक धर्मशाला महापुरुषों की मूर्ति शिक्षण संस्थाओं का नाम करण रखवाकर खुश हो जाते हैं वहीं छोटे मोटे काम को ज्ञापन देकर खुश हो जाते हैं।


जैसे छत्तीसगढ़ में बना एक विधायक दाढ़ी बनाता घूम रहा है, और विधायक निधि से अपने क्षेत्र में प्रत्येक समाज की धर्मशाला पांच लाख रुपए में बनवाने की घोषणा कर रहा है लेकिन मजाल है कि एक बार यह कह दे कि भईया आप लोग देश प्रदेश की सरकार के राजा हैं क्यों नहीं लैटरल एंट्री सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट सहित तमाम निजिकरण में आरक्षण लागू करा देते ताकि कोई जाति धर्म स्वयं को छिहत्तर साल की आजादी के बाद भी ठगा महसूस ना कर सके। मजेदार बात तो यह कि यहां प्रजापति विधायक बने तो कुम्हारी कला, नाई बने तो केश कला, बढई बनें तो विश्वकर्मा पूजा , की छुट्टी तय करवाने से आगे नहीं निकल पाता और वोट के लूटेरे इनकी छोटी सी मानसिकता समझ उसे पूरी करने में वाहवाही बटोरने में कमी नहीं करते और खुद सत्ता हासिल कर इन्हें जातिगत स्तर पर रखकर कभी जमात में नहीं शामिल होने देना चाहते हैं। शायद इन्हें पता है कि यदि देश के वास्तविक गुलाम को एक बार सत्ता सौंप दी तो फिर इन नव्वे प्रतिशत आबादी से वापिस आने वाली नहीं है। बिहार बंगाल असम उड़िया उत्तर प्रदेश हिमाचल उत्तराखंड छत्तीसगढ़ झारखंड राजस्थान हरियाणा हो या अन्य कोई राज्य केवल एक एम एल सी या राज्य सभा देकर मात्र राज्य मंत्री बनाकर पुस्तैनी धंधों को मजबूती प्रदान करने का वादा कर दो, इतने भर से यह जातियां पचास साल तक गुलाम बनाकर रखी जा सकती हैं ऐसा वोट ठगने वाले भलि भांति जानते हैं लेकिन तमाम रुकावटों के बावजूद तेजी से शिक्षा की ओर दोडकर शेरनी का दूध पी रहें युवा वर्ग ही नहीं बुजुर्गो ने भी अब इस साजिश को समझना शुरू कर दिया है।


एक एम एल सी चिल्लाकर अपनी जाति बताती घूम रही है, दौ कौड़ी का साधू औकात बता रहा। देश के कई बड़े साधु सैंन जी महाराज सहित तमाम महापुरुषों का अपमान का कर रहे हैं। केंद्र सरकार में राज्य मंत्री बने रामनाथ जी उत्तर प्रदेश की गुलदस्ता टीमों से कह रहे हैं मैंने बिहार में पांच हजार दाढ़ी बनाने की गुमटी बनाकर समाज के लोगो को आत्म निर्भर बनाने का काम किया लेकिन एक व्यक्ति गुलदस्ता लेकर नहीं आया उत्तर प्रदेश के लोग गुलदस्ते भेट कर जाति से हमेशा दूरी बनाकर रखने वाले रामनाथ जी से राज्य मंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश में सामाजिक विकास की उम्मीद पाल रहे हैं उधर मोदी जी कर्पूरी जी के टिकट पर बनियान पहने नाई को दाढ़ी बनाते हुए दिखाकर और विश्वकर्मा सम्मान योजना में पुस्तैनी धंधों के लिए लोन की घोषणा कर चुके हैं उधर मुख्यमंत्री समाज के कार्यक्रम में अच्छे हाथ के दस्तकार और डाकिया बताकर किट दिलाने की घोषणा कर ही चुके हैं, इधर समाज वादी पार्टी और बसपा भी लेटर जारी करके उनकी जाति को अपमानित करने में संकोच नहीं करती। लेकिन लम्बे समय से समाज की ठेकेदारी कर रहे सभी जातियों के तथाकथित समाजसेवी चूललू भर पानी में डूबने को तैयार नहीं है और जो सिद्धांत बनाकर आए नए दल आवश्यकता न होने के बावजूद उनसे समर्थन मांगते तो ऐसे खुदा बन जाते है जैसे इनकी जाति की ठेकेदारी इनके नाम पर चलतीं हो मन तो करता है ऐसे समाज के दुश्मनों को इसी गुलामी में छोड़कर इन्हीं का गुलाम बन जाऊं या सामाजिक जातिगत उत्पीड़न झेल रहे समाज के साथ धोखाधड़ी गुमराह करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करा दूं और खुद को पीछे खींच कर अपनी जाति या धर्म दोनों बदल डालूं । तमाम अतिपिछड़ी जातियों के बड़बोले निजी स्वार्थ में डूबे लोगो में से कोई दिल्ली में धर्मशाला कोई लखनऊ में धर्मशाला कोई ट्रस्ट में चंदाखोरी कोई गोवा गुजरात में बीस लोगों की बैठक कोई प्रतिभा सम्मान तो मूर्ति स्थापना तो कोई भक्ति में लीन हैं और सही बात करने वाले को अपना दुश्मन मानते हैं जबकि किसी से भी किसी की कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है सैकड़ों संगठन तो चंदा खोरी में लिप्त है कोई शादी कराने में मस्त हैं तो शादी कराने में भी चंदा झटक लेता है कोई महापुरुषों की किताब बेचकर तो कोई धर्मशालाओं के नाम पर चंदा इकट्ठा कर बड़ा नेता कहलाने में मस्त हैं क्योंकि वैसे भी सामाजिक व्यक्तिगत और स्वास्थिक रुप से मर चुके लोगों की आत्मा भी मर चुकी होती है और उम्र बढ़ने पर शायद उनकी सोच बन जाती है कि मैं नहीं तो कोई नहीं और फिर वह आखरी रास्ते पर चलकर मृत्यु को प्राप्त हो जातें हैं । यह हाल अतिपिछड़ों में आने वाली सभी जातियों का रहा है जिससे यह अच्छे प्लेटफार्म की तलाश में अपना घर बनाने में जुटे हैं।

लेखक - विनेश ठाकुर दैनिक समाचार पत्र विधान केसरी के समूह सम्पादक हैं जो वर्तमान में लीवर ट्रांसप्लांट कराकर अतिपिछड़ों को शासन सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने की शपथ लेकर एक राजनीतिक दल चलाने की ओर दौड़ रहे हैं।


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