लोग अपने हार्ट को हेल्दी रखने के लिए अक्सर सुबह टहलते हैं, कम तेल वाला खाना खाते हैं, ब्लड प्रेशर चेक काराते हैं साथ ही शुगर कंट्रोल रखकर समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराते हैं। लेकिन अगर यही सवाल दिमाग की सेहत को लेकर पूछा जाए, तो ज़्यादातर लोग कुछ पल सोचने लगते हैं। शायद इसलिए क्योंकि हम दिमाग के बारे में तब सोचते हैं, जब कोई बड़ी समस्या सामने आ जाती है स्ट्रोक हो जाए, हाथ कांपने लगें, याददाश्त कमजोर होने लगे या बोलने में दिक्कत आने लगे। जबकि सच यह है कि दिमाग भी दिल की तरह रोज़ हमारी देखभाल चाहता है।
सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट एवं क्लिनिकल लीड, डॉक्टर नेहा पंडिता, कहती हैं कि मैं ऐसे मरीजों से मिलती हूँ, जो कहते हैं, "डॉक्टर, पिछले कुछ महीनों से चीज़ें भूलने लगा हूँ, लेकिन लगा कि उम्र का असर होगा।" कोई बताता है कि चलते समय संतुलन पहले जैसा नहीं रहा, तो कोई हाथों में हल्का कंपन महसूस होने की बात करता है। ज़्यादातर लोग इन शुरुआती बदलावों को गंभीरता से नहीं लेते।
दिमाग हमें अचानक नहीं चौंकाता, वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है। ज़रूरत सिर्फ उन्हें पहचानने की होती है।दिल और दिमाग का रिश्ता भी बेहद गहरा है। जिन लोगों का ब्लड प्रेशर लंबे समय तक बढ़ा रहता है, शुगर नियंत्रित नहीं रहती, कोलेस्ट्रॉल अधिक होता है या धूम्रपान की आदत होती है, उनमें सिर्फ हार्ट अटैक का ही नहीं, बल्कि स्ट्रोक और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है। यानी जो आदतें दिल को नुकसान पहुंचाती हैं, वही धीरे-धीरे दिमाग को भी प्रभावित करती हैं।
सुबह उठते ही मोबाइल देखना, घंटों स्क्रीन के सामने बैठना, पर्याप्त नींद न लेना, लगातार तनाव में रहना और शारीरिक गतिविधि का कम होनाये - सब धीरे-धीरे दिमाग पर असर डालते हैं। कई युवा मरीज कहते हैं, "डॉक्टर, कुछ भी याद नहीं रहता। ध्यान नहीं लगता।" जांच करने पर हमेशा कोई बड़ी बीमारी नहीं मिलती, लेकिन उनकी दिनचर्या बताती है कि दिमाग को आराम मिलने का मौका ही नहीं मिल रहा।
डॉक्टर कहती हैं कि अक्सर लोग पूछते हैं कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए कौन-सी दवा लें। दिमाग की सबसे अच्छी दवा कई बार दवा नहीं, बल्कि अच्छी जीवनशैली होती है। रोज़ थोड़ा चलना, पर्याप्त नींद लेना, नई चीज़ें सीखना, किताबें पढ़ना, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना, संगीत सुनना और तनाव को संभालना - ये सब मस्तिष्क को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारा मस्तिष्क जितना उपयोग में आता है, उतना ही बेहतर काम करता है।
हालांकि डॉक्टर यह भी कहती हैं कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हर भूलना किसी गंभीर बीमारी का संकेत है। हम सभी कभी-न-कभी चाबियाँ कहीं रखकर भूल जाते हैं या किसी का नाम याद करने में कुछ सेकंड लग जाते हैं। लेकिन अगर भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही हो, रोज़मर्रा के काम प्रभावित होने लगे हों, बोलने, चलने या संतुलन बनाए रखने में बदलाव महसूस हो, तो इसे सिर्फ "उम्र का असर" कहकर टालना ठीक नहीं है।
