कहा जा रहा है कि इस रॉकेट के टुकड़े के चांद से टकराने से वहां (चंद्रमा) एक गड्ढा (क्रेटर) बन गया है। वैज्ञानिक इसे और जानने के एक मौके के तौर पर देखते हैं कि कैसे कृत्रिम वस्तुएं खगोलीय पिंडों से टकराती हैं, और साथ ही अंतरिक्ष के मलबे पर नज़र रखने की कोशिशों को तेज़ करने के अवसर के रूप में भी।
वैज्ञानिकों और हजारों आम लोग भी इस घटना को देखने के लिए उत्सुक थे। कहा जा रहा है कि पृथ्वी के लिए चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि इस टक्कर से यहां कोई खतरा नहीं है। हालांकि इसे पृथ्वी से नंगी आंखों (बिना किसी इक्विपमेंट) से देखना मुश्किल था।
रिपोर्ट के अनुसार, इस रॉकेट ने जनवरी 2025 में फायरफ्लाई एयरोस्पेस के लूनर लैंडर को चंद्रमा की ओर भेजा था, जो भारतीय समयानुसार बुधवार को दोपहर लगभग 12.05 बजे चंद्रमा की सतह से 8,690 किमी/घंटा की रफ्तार से टकराया। हालांकि ये बात पहले ही कही गई थी कि रॉकेट के इस टुकड़े के चंद्रमा के पश्चिमी किनारे पर मौजूद आइंस्टीन क्रेटर से टकराने की उम्मीद है, इसी वजह से इसे पृथ्वी से देखना मुश्किल होता है।
आप ये सोच रहे होंगे कि रॉकेट का यह हिस्सा धरती पर क्यों नहीं गिरेगा। दरअसल रॉकेट के इन अलग-अलग हिस्सों को 'स्टेज' कहा जाता है, जो आमतौर पर रॉकेट के पेलोड को कक्षा में सही जगह पर पहुंचाने के बाद ये स्टेज पृथ्वी के वायुमंडल में वापस गिरकर जल जाते हैं या समुद्र में गिर जाते हैं। लेकिन 2025 के लूनर लैंडर मिशन के लिए पृथ्वी के पास वाले मिशनों की तुलना में ज्यादा जोर (थ्रस्ट) की जरूरत थी, इसलिए रॉकेट का दूसरा चरण अंतरिक्ष में ही रह गया और यह हजारों मलबे के टुकड़ों के बीच बिना किसी निश्चित दिशा के तैरता रहा।
