लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पारदर्शी तबादला नीति और शासन के सख्त निर्देशों को लखनऊ नगर निगम के अफसर किस कदर ठेंगा दिखा रहे हैं, इसकी जीती-जागती तस्वीर अब खुलकर सामने आ गई है। तीन साल का कार्यकाल पूरा कर चुके कई कर्मचारियों और अधिकारियों के स्थानांतरण आदेश जारी हुए अरसा बीत चुका है, लेकिन श्रसूख और जुगाड़श् के दम पर ये महोदय अब तक अपनी पुरानी कुर्सी से हटने को तैयार नहीं हैं।
खासकर नगर निगम के स्वास्थ्य और टैक्स विभाग में तबादलों का खेल खुलकर सामने आ रहा है। शासन के स्पष्ट आदेशों के बावजूद दर्जनों कर्मचारी नए तैनाती स्थल पर कार्यमुक्त ही नहीं किए गए हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि जब स्थानांतरण का फरमान जारी हो चुका है, तो आखिर किस श्अदृश्य दबावश् या श्पहुंचश् के चलते इन्हें पुरानी जगह पर ही मलाई काटने की छूट दी जा रही है? नगर निगम के गलियारों में चर्चा गरम है कि रसूखदार कर्मचारियों के आगे प्रशासनिक व्यवस्था ने घुटने टेक दिए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब शासन की तबादला नीति सबके लिए समान है, तो कुछ खास कर्मचारियों पर मेहरबानी क्यों? क्या नगर निगम प्रशासन में नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित है? क्या रसूख और सांठगांठ के आगे मुख्यमंत्री के सख्त निर्देश भी बौने साबित हो रहे हैं?
स्थानान्तरण आदेशों को ठंडे बस्ते में डालकर मनमानी करने वाले इन श्चहेतेश् कर्मचारियों और अफसरों पर नगर निगम प्रशासन अब क्या कार्रवाई करता है, या फिर यह पूरी प्रक्रिया केवल एक कागजी खानापूरी बनकर रह जाएगी। इस पर सभी की निगाहें टिकी है।
