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खनन सिंडीकेट की भेंट चढ़ती नदियां! सुप्रीम कोर्ट और NGT के आदेशों की सरेआम धज्जियां


  •  निजी कम्पनी ने खुलेआम लूट केंद्र स्थापित किए 

लखनऊ/​रामपुर/मुरादाबाद/काशीपुर! एक तरफ देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) नदियों के अस्तित्व को बचाने के लिए कड़े निर्देश दे रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर सक्रिय 'खनन सिंडीकेट' ने पर्यावरण के विनाश की नई पटकथा लिख दी है। निजी कंपनियों की बेलगाम वसूली और अवैध खनन के कारण अब न केवल राजस्व डूब रहा है, बल्कि क्षेत्र की जीवनदायिनी नदियां अपना अस्तित्व खोने की कगार पर हैं।

​1. अस्तित्व खोती नदियां: पर्यावरण के साथ 'खूनी खेल'

​कैलाश रिवर और मिनरल्स जैसी कंपनियों के द्वारा नदियों के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। मशीनों के जरिए नदी के तल को इतना गहरा कर दिया गया है कि जलस्तर (Water Table) लगातार नीचे गिर रहा है।  खनन के खेल को बिना सरकार की मर्जी के नहीं खेला जा सकता यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन उत्तराखंड सरकार द्वारा एक कम्पनी को तीन सौ करोड़ रुपए में एक साल के लिए दिया गया वसूली का ठेका जहां तमाम स्टोन्स क्रेशर को बंदी के कगार पर पहुंचा रहा है वहीं ट्रांसपोर्ट कम्पनी भी अपने डमफर खड़े करने को मजबूर हो गई है।

​प्राकृतिक बहाव बाधित: वैज्ञानिक नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे खनन से नदियों का रास्ता बदल रहा है, जिससे भविष्य में भीषण बाढ़ और कटाव का खतरा पैदा हो गया है।

​पारिस्थितिकी तंत्र तबाह: जलीय जीवों और नदी के किनारों की वनस्पतियों का नामोनिशान मिटाया जा रहा है।

2. सुप्रीम कोर्ट और NGT की रोक का मखौल

​सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि बिना 'एनवायरमेंटल क्लीयरेंस' और निर्धारित मानकों के खनन नहीं किया जा सकता। NGT ने भी कई बार स्पष्ट किया है कि नदियों के बीच धारा से मशीनी खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।

​बैरियर और मनमानी: जहाँ कोर्ट ने अवैध वसूली पर रोक लगाई है, वहीं निजी कंपनियों ने 'अवैध वसूली बैरियर' लगाकर कानून को चुनौती दी है।

​प्रशासनिक मिलीभगत: NGT के सख्त निर्देशों के बावजूद स्थानीय पुलिस और तहसील प्रशासन का मौन यह साबित करता है कि सिंडीकेट के हाथ सत्ता के गलियारों तक बहुत गहरे हैं।

3. राजस्व चोरी के साथ 'पर्यावरण टैक्स' का गबन

​खनन नियमावली के अनुसार, खनन से होने वाली आय का एक हिस्सा पर्यावरण सुधार (Reclamation) के लिए खर्च होना चाहिए। लेकिन यहाँ खेल उल्टा है: ​₹8 प्रति कुंतल की वसूली निजी कंपनी की जेब में जा रही है, न कि पर्यावरण के संरक्षण में।

​अवैध मंडी: रामपुर और मुरादाबाद के रास्ते होने वाली इस राजस्व चोरी ने सरकार को पंगु बना दिया है, जिससे न तो नई सड़कों का निर्माण हो पा रहा है और न ही नदियों का पुनरुद्धार।

4. स्टोन क्रेशर उद्योग की आहुति

​निजी कंपनियों की मनमानी वसूली और यूपी सरकार के भारी-भरकम जुर्माने की मार ने दो दर्जन से ज्यादा स्टोन क्रेशरों की बलि ले ली है। जो उद्योग नियमों के तहत चलना चाहते थे, उन्हें सिंडीकेट ने रास्ते से हटा दिया है ताकि 'अवैध खेल' बेखौफ चलता रहे।

मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:-

​क्या NGT की निगरानी समितियां केवल कागजों पर काम कर रही हैं?

​सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद सड़कों पर निजी कंपनियों के बैरियर कैसे लगे हैं?

​नदियों के सीने को छलनी कर रहे इन डंपरों और मशीनों पर जिला प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ती?

निष्कर्ष: यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हक को छीनने का अपराध है। यदि आज इन नदियों को खनन माफिया के चंगुल से नहीं छुड़ाया गया, तो भविष्य में ये नदियाँ केवल इतिहास के पन्नों और सूखी रेत के मैदानों में ही मिलेंगी।

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