संत कबीर नगर: जनसंख्या विस्फोट की आंच में सुलग रहा जातिवाद, संसाधनों की जंग ने बढ़ाई सामाजिक खाई
April 19, 2026
संत कबीर नगर। भारत में जनसंख्या वृद्धि और जातिगत तनाव दोनों ही दशकों से बहस के केंद्र में रहे हैं। एक तर्क यह है कि तेजी से बढ़ती आबादी ने सीमित संसाधनों पर दबाव बढ़ाकर जाति-आधारित प्रतिस्पर्धा को और तीखा कर दिया है। जब अवसर कम हों और दावेदार ज्यादा, तो पहचान के आधार पर गोलबंदी स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। भारत की आबादी 2026 में 145 करोड़ के पार है। नौकरी, जमीन, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजों के लिए प्रति व्यक्ति उपलब्धता लगातार घट रही है। सरकारी नौकरियों में पद सीमित हैं, उच्च शिक्षा की सीटें सीमित हैं, और खेती की जोत का आकार हर पीढ़ी में छोटा हो रहा है। ऐसे में आरक्षण, योजनाओं का लाभ और स्थानीय स्तर पर रोजगार के लिए अलग-अलग जाति समूहों के बीच खींचतान तेज हुई है। जब 100 पदों के लिए 1 लाख दावेदार हों, तो हर समूह अपने लिए ‘पहले हम’ का तर्क मजबूत करता है। पहले गांवों में जातिगत समीकरण पीढ़ियों से तय थे। जनसंख्या बढ़ने से शहरों की ओर पलायन बढ़ा। शहरों में गुमनामी मिलती है, लेकिन जब आवास, झुग्गी-झोपड़ी की जमीन, रेहड़ी-पटरी की जगह या सरकारी मकान के लिए संघर्ष होता है, तो लोग फिर अपने जाति-समूहों में एकजुट हो जाते हैं। वोट बैंक से लेकर मोहल्ला समितियों तक, जाति एक बार फिर पहचान का सबसे तेज औजार बन जाती है। ज्यादा आबादी का मतलब है ज्यादा वोट। चुनावी राजनीति में जाति-आधारित समीकरण बनाने की प्रवृत्ति तेज हुई है। छोटे-छोटे उप-जाति समूह भी अब अपने संख्या बल को राजनीतिक सौदेबाजी में बदल रहे हैं। जनसंख्या विस्फोट ने हर विधानसभा में वोटों का गणित इतना बारीक कर दिया है कि पार्टियां जाति-आधारित वादों और नारों पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। नतीजा, सार्वजनिक विमर्श में जाति केंद्र में आ गई है। बढ़ती आबादी के बीच बेरोजगारी और अर्ध-बेरोजगारी बड़ी समस्या है। जब युवा को लगता है कि उसकी मेहनत के बावजूद अवसर किसी और को मिल रहा है, तो वह उसका कारण ‘व्यवस्था’ में नहीं, बल्कि ‘दूसरे समूह’ में ढूंढता है। सोशल मीडिया पर यह भावना तेजी से फैलती है। एक पद, एक ठेका, एक योजना का लाभ - हर चीज ‘हमारे लोग बनाम उनके लोग’ की बहस में बदल जाती है। ग्रामीण भारत में प्रति परिवार जमीन का टुकड़ा सिकुड़ रहा है। चकबंदी लंबित है, मुकदमे बढ़ रहे हैं। पानी का स्तर गिर रहा है। ऐसे में गांव के भीतर भी जातिगत आधार पर पुराने झगड़े नए सिरे से भड़कते हैं। ‘तालाब पर पहला हक किसका’, ‘शमशान की जमीन किसकी, ‘मनरेगा में मेट कौन बनेगा, ये सब सवाल अब ज्यादा विस्फोटक हो गए हैं क्योंकि आबादी ज्यादा है और संसाधन कम। जातिवाद की जड़ें ऐतिहासिक हैं, लेकिन जनसंख्या विस्फोट ने उसे नई हवा दी है। जब तक अवसरों की तुलना में दावेदारों की संख्या बेलगाम रहेगी, तब तक हर संसाधन के लिए संघर्ष पहचान के आधार पर लड़ा जाएगा। इसका समाधान केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि जनसंख्या स्थिरीकरण, कौशल-आधारित रोजगार सृजन, और संसाधनों का समान विस्तार है। वरना भीड़ बढ़ती रहेगी और खाई गहरी होती रहेगी।
