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हिरणों की जिंदगी पर संकट, डियर पार्क से टाइगर रिजर्व भेजने के फैसले पर उठे सवाल



दिल्ली के हौज खास स्थित एएन झा डियर पार्क में 19 अप्रैल (रविवार) की सुबह एक असामान्य हलचल देखने को मिली. सुबह 9 बजे से ही कई सामाजिक और पर्यावरणीय संगठन पार्क के गेट पर जुटने लगे. उद्देश्य साफ था, हिरणों के साथ हो रहे व्यवहार पर सवाल उठाना और उनके ट्रांसलोकेशन को लेकर सरकार की नीतियों पर विरोध दर्ज कराना.

इस विरोध में एनिमल वेलफेयर सोसाइटी ऑफ इंडिया, न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी, वॉक फॉर एनिमल्स एंड हैबिटेट और कैंपेन फॉर डिफरेंटली एबल्ड जैसे कई संगठन शामिल हुए. दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और टेरी के छात्र-शिक्षकों के साथ-साथ इलाके के बुजुर्ग मॉर्निंग वॉकर्स भी इस अभियान में शामिल हुए. सभी का एक ही सवाल था, क्या इन मासूम चीतल हिरणों को शिकारियों के बीच भेजना सही है?
प्रदर्शनकारियों ने बताया कि चीतल हिरण स्वभाव से बेहद शर्मीले होते हैं और बाघ जैसे शिकारी जानवरों के सामने उनका बचाव बेहद कमजोर होता है. ऐसे में उन्हें राजस्थान के टाइगर रिजर्व में भेजना उनके लिए मौत के मुंह में धकेलने जैसा है. यह भी सामने आया कि देश के कई अभयारण्यों में पहले ही हिरणों की संख्या बाघों और चीता जैसे शिकारी जीवों के कारण तेजी से घटी है. एक समय में राजस्थान के जंगलों में चीतल हिरणों के बड़े झुंड देखने को मिलते थे, लेकिन अब रणथंभौर से मुकुंदरा तक का इलाका लगभग खाली हो चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि चीता प्रोजेक्ट के बाद से शिकार बनने वाले जीवों की संख्या तेजी से कम हुई है, जिससे शिकारी जानवर अब गांवों की ओर रुख कर रहे हैं.
कोर्ट के निर्देश पर किए गए एक सर्वे में खुलासा हुआ कि 2024 में भेजे गए 261 हिरणों में से केवल 17 ही जंगल में जीवित मिले. कई हिरणों की हड्डियां बिखरी मिलीं और कुछ के पैरों में रस्सियां तक बंधी थीं. इतना ही नहीं, एक पिंजरे में मोर का शव सड़ता हुआ मिला, जो वन विभाग की लापरवाही को उजागर करता है. डीडीए के पास इस बात का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि ट्रकों में भरकर 14 घंटे की यात्रा के बाद कितने हिरण जिंदा बचे. गर्भवती मादा हिरणों और अन्य जानवरों के साथ क्या हुआ, इसका भी कोई हिसाब नहीं है. यह भी आशंका जताई गई कि रास्ते में कुछ जानवरों को मांस व्यापारियों को सौंप दिया गया.
आईयूसीएन और सीजेडए की गाइडलाइंस का खुलेआम उल्लंघन किया गया. नियमों के बावजूद गर्भवती, बीमार और सींग वाले हिरणों को ट्रांसफर किया गया. ट्रांसलोकेशन के दौरान न तो टैगिंग की गई और न ही उनके लिए उचित प्रशिक्षण और अनुकूलन व्यवस्था की गई, जिससे वे आसानी से शिकार बन गए.

डीडीए ने 335 एकड़ अरावली वन भूमि में से केवल 10 एकड़ ही हिरणों के लिए छोड़ा, जबकि बाकी जमीन का इस्तेमाल रिसॉर्ट, बारात घर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया गया. इससे हिरणों का प्राकृतिक आवास सीमित हो गया और वे पानी एवं भोजन की कमी से जूझते रहे.
2014 और 2015 की रिपोर्टों में पहले ही यह सामने आ चुका था कि डीडीए हिरणों की देखभाल में लापरवाही बरत रहा है और उनके लिए उचित व्यवस्था नहीं है. विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि यदि 20 एकड़ जमीन और जोड़ दी जाए तो समस्या का समाधान हो सकता है, लेकिन इस पर कभी अमल नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का फैसला केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) पर छोड़ दिया है. हालांकि, समिति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि उसने अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइंस को नजरअंदाज करते हुए डीडीए के पक्ष में निर्णय दिया.
प्रदर्शनकारियों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि, अगर डियर पार्क संरक्षित क्षेत्र है तो हिरणों को वहीं क्यों नहीं रखा जा सकता? उनकी संख्या, देखभाल और भोजन को लेकर पारदर्शिता क्यों नहीं है? और आखिर क्यों उनके प्राकृतिक आवास को व्यावसायिक गतिविधियों में बदला गया? सभी संगठनों और नागरिकों ने एक स्वर में मांग की कि जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक हिरणों के ट्रांसलोकेशन पर रोक लगाई जाए. उनका कहना है कि समस्या का समाधान हिरणों को हटाना नहीं, बल्कि उनके लिए बेहतर प्रबंधन और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है.

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