धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल से सुनवाई
April 05, 2026
धार्मिक परंपराओं के पालन और महिलाओं अधिकारों से जुड़ी एक ऐतिहासिक सुनवाई सुप्रीम कोर्ट करने जा रहा है. 7 अप्रैल से शुरू हो रही इस सुनवाई में कई अहम सवालों पर विचार किया जाएगा. केरल के सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को लेकर शुरू हुआ यह मसला मस्जिद में महिलाओं के नमाज पढ़ने, दाउदी वोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना जैसे कई मसलों को सीधे प्रभावित करेगा.
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता में सुनवाई के लिए 9 जजों की बेंच का गठन किया गया है. बेंच के सदस्य हैं- जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जोयमाल्या बागची.
यह विवाद शुरू हुआ 28 सितंबर 2018 को आए सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले से. यह फैसला इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल सरकार मामले आया था. भगवान अयप्पा से जुड़े सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के जाने पर रोक थी. सुप्रीम कोर्ट ने उसे हटाने का फैसला दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का केरल में व्यापक विरोध हुआ. विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि भगवान अयप्पा को नैसिक ब्रह्मचारी माना जाता है. वह युवा महिलाओं से नहीं मिलते. जिन महिलाओं को भगवान अयप्पा में सचमुच आस्था है, वह उनके ब्रह्मचारी रूप को स्वीकार कर खुद रजस्वला उम्र तक वहां नहीं जातीं. जो महिलाएं वहां जाने की मांग कर रही हैं, उन्हें देवता में आस्था ही नहीं है. उनकी नजर में वह मंदिर नहीं, एक पर्यटन स्थल है.
लोगों का यह भी कहना था कि मंदिर की यात्रा से पहले 41 दिन तक पूरी शुद्धता बनाए रखने का नियम है. रजस्वला स्त्रियों के लिए 41 दिन तक शुद्धता बनाए रखने के व्रत का पालन संभव नहीं है. यह प्राचीन काल से चली आ रही धार्मिक परंपरा है. कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए था. इस मसले को लेकर कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं. उनमें कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 25 और 26 सभी को अपनी मान्यताओं के मुताबिक धर्म के पालन का अधिकार देता है. 2018 में आया फैसला भगवान अयप्पा के श्रद्धालुओं के इस अधिकार का हनन करता है.
सुप्रीम कोर्ट में होने जा रही सुनवाई सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है. इसके साथ ही कोर्ट ने मस्ज़िद में महिलाओं को नमाज की अनुमति, गैर पारसी से शादी करने वाली पारसी लड़कियों को अग्यारी (पारसी अग्नि मंदिर) में प्रवेश से रोकने, दाउदी वोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना (FGM) जैसे मसलों पर दाखिल याचिकाओं को भी सुनवाई के लिए लगा रखा है. इसका कारण है कोर्ट का 2019 का एक आदेश.
14 नवंबर, 2019 को दिए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन सभी मामलों में मुख्य संवैधानिक सवाल एक जैसे ही हैं. यह सवाल संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिए धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार और दूसरे मौलिक अधिकारों के बीच के संबंध से जुड़े हैं. सरल शब्दों में कहें तो कोर्ट यह देखेगा कि धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार समानता, स्वतंत्रता और सम्मान से जीवन जीने से जुड़े मौलिक अधिकारों को किस हद तक बाधित कर सकता है.कोर्ट के पिछले आदेश के मुताबिक यह सुनवाई कुल 8 दिन चलेगी. 7 से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार का समर्थन करने वाले पक्ष अपनी दलीलें देंगे. 14 से 16 अप्रैल तक विरोध करने वाले पक्ष अपनी बात रखेंगे. 21 अप्रैल को पुनर्विचार समर्थक पक्ष जवाबी तर्क देगा. 22 अप्रैल को सुनवाई पूरी होगी. उस दिन मामले में एमिकस क्यूरी के रूप में कोर्ट की सहायता कर रहे वरिष्ठ वकील के परमेश्वर अपनी बात रखेंगे.
