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NCERT की किताब में न्यायपालिका पर विवादित बातों के जिम्मेदार शिक्षाविदों को सुप्रीम कोर्ट ने काम से हटाया! सोशल मीडिया हैंडल्स पर भी होगी सख्ती


NCERT की किताब में न्यायपालिका के बारे में विवादित बातें लिखने के जिम्मेदार शिक्षाविदों पर सुप्रीम कोर्ट की गाज गिरी है. कोर्ट ने केंद्र या राज्य सरकार से फंड पाने वाले सभी संस्थानों को इन लोगों से तत्काल संबंध खत्म करने को कहा है. इसके साथ ही कोर्ट ने उन वेबसाइट्स और सोशल मीडिया हैंडल्स की भी जानकारी मांगी है जिन्होंने न्यायपालिका के बारे में अपमानजनक बातें कही थीं. कोर्ट ने कहा है कि इन लोगों पर जरूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

NCERT की कक्षा 8 की एक किताब में 'न्यायिक भ्रष्टाचार' पर लिखे गए अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. 26 फरवरी को कोर्ट ने किताब पर रोक लगा दी थी. वेबसाइट पर ऑनलाइन उपलब्ध किताब की पीडीएफ फाइल को भी हटाने का आदेश दिया था. साथ ही, डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन के सचिव और NCERT के निदेशक को नोटिस जारी किया था.

बुधवार, 11 मार्च को हुई सुनवाई में कोर्ट को बताया गया कि उसके आदेश का पालन किया गया है. सभी किताबें वापस ले ली गई हैं. कोर्ट के नोटिस के जवाब में दोनों अधिकारियों ने बिना शर्त माफी मांगी है. वह व्यक्तिगत रूप से भी कोर्ट में मौजूद हैं. चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने इस पर संतोष जताते हुए उनके माफीनामे को स्वीकार कर लिया. हालांकि, जज NCERT निदेशक की इस बात पर आश्वस्त नजर नहीं आए कि अध्याय को दोबारा लिखा गया है. उन्होंने कहा कि किताब के प्रकाशन से पहले उसे एक नई कमेटी को दिखाया जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह 1 सप्ताह के भीतर 3 सदस्यीय कमेटी बनाए. इसमें एक वरिष्ठ पूर्व जज, एक शिक्षाविद और एक वरिष्ठ वकील को रखा जाए. यह कमेटी तय करे कि न्यायपालिका के बारे में लिखे गए अध्याय में क्या बातें हों. कोर्ट ने स्कूली शिक्षा की दूसरी किताबों में भी न्यायपालिका के बारे में लिखी गई बातों की समीक्षा का भी आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा करना भविष्य के लिए बहुत घातक होगा.

आदेश में लिखा गया है कि अध्याय को तैयार करने वाले विशेषज्ञों को या तो न्यायपालिका के बारे में जानकारी नहीं है या उन्होंने जान-बूझकर न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की इसलिए, यह तीनों विशेषज्ञ इस योग्य नहीं हैं कि उन्हें इस तरह के काम में रखा जाए. सरकारी अनुदान वाली कोई भी संस्था माइकल डेनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना को काम नहीं दे. कोर्ट ने यह भी कहा है कि इस आदेश में बदलाव के लिए यह लोग उसके पास आवेदन दाखिल कर सकते हैं. उनका पक्ष सुनने के बाद निर्णय लिया जाएगा.

जजों ने सख्त रवैया अपनाते हुए गैरजिम्मेदार सोशल मीडिया अकाउंट्स को सबक सिखाने की भी बात कही. कोर्ट ने सरकार से विवादित किताब मामले में न्यायपालिका के बारे में अपमानजनक बातें कहने वाले अकाउंट्स का ब्यौरा मांगा है. चीफ जस्टिस ने सख्त लहजे में कहा, 'अगर इन अकाउंट्स को चलाने वाले विदेश में बैठे हैं, तब भी हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे. हम समस्या का सीधे और दृढ़ता से सामना करने में विश्वास रखते हैं. शरारत करने वालों के खिलाफ कानून को अपना काम करेगा.'

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