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बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव की जन सुराज पार्टी की मांग सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी


बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को चुनौती देने वाली याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है. यह याचिका प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी ने दाखिल की थी. याचिका में महिलाओं को चुनाव से पहले 10 हजार रुपए ट्रांसफर किए जाने का विरोध किया गया था. सुनवाई के दौरान जजों ने राजनीतिक लड़ाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल करने की कोशिश के लिए याचिकाकर्ता को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए जन सुराज के लिए पेश वकील ने याचिका वापस ले ली.

पिछले साल नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन को दोबारा जीत मिली थी और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी थी. जन सुराज ने याचिका दाखिल कर कहा था कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत नए लाभार्थियों को जोड़ना और उन्हें आदर्श आचार संहिता के दौरान भुगतान करना गलत था. यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अलावा जनप्रतिनिधत्व कानून के प्रावधानों का भी उल्लंघन है.

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने याचिका के औचित्य पर सवाल उठाए. जस्टिस बागची ने कहा, 'आप किसी एक सीट की नहीं, बल्कि पूरा चुनाव ही रद्द करने की मांग कर रहे हैं. हमें दिखाइए कि जनप्रतिनिधत्व कानून की धारा 100 में इसकी व्यवस्था कहां दी गई है? वैसे भी चुनाव याचिका हाई कोर्ट में दाखिल होती है.'

जन सुराज के लिए पेश वरिष्ठ वकील सी यू सिंह ने जजों को सुनवाई के लिए सहमत करने की कोशिश करते हुए कहा, 'बिहार देश के सबसे अधिक कर्ज में डूबे राज्यों में से एक है, जहां 15,600 करोड़ रुपये का कर्ज है. वहां राजनीतिक लाभ के लिए पैसे बांटे गए. चुनाव से पहले लाखों महिलाओं को पैसे दे कर दूसरी पार्टियों के लिए समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) को बिगाड़ा गया.'

इसके बाद चीफ जस्टिस ने जन सुराज को आड़े हाथों लेते हुए कहा, 'आपको कितने वोट मिले हैं? चुनाव हार जाने के बाद अब आप कोर्ट का इस्तेमाल कर उसे रद्द करने की मांग कर रहे हैं.' चीफ जस्टिस ने आगे कहा, 'सरकारों की तरफ से दी जाने वाली फ्रीबिज का मसला एक अहम विषय है. इस पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है, लेकिन किसी राजनीतिक पार्टी के कहने पर हम सुनवाई नहीं कर सकते. अगर आप सत्ता में आ जाते तो शायद आप भी इसी तरह की योजनाएं चलाते.'

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