कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा ने जांच कमेटी बनाने को दी चुनौती
January 07, 2026
कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर बुधवार (7 जनवरी, 2026) को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से लिया गया कमेटी बनाने का फैसला गलत कैसे हो सकता है. जस्टिस वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से जांच कमेटी बनाने को चुनौती दी है. उनका कहना है कि राज्यसभा और लोकसभा में एक ही दिन 21 जुलाई को नोटिस दिया गया था. ऐसे में एक सदन कमेटी नहीं बना सकता था.
कोर्ट ने यशवंत वर्मा से पूछा कि एक ही सदन की तरफ से जांच कमेटी बनाने से उन्हें क्या समस्या है. सुप्रीम कोर्ट इसमें क्यों दखल दे.
पिछले महीने कोर्ट ने इस पर लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय से जवाब मांगा था. सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने कहा, '21 जुलाई को दोनों सदन में नोटिस जरूर दिया गया, लेकिन 11 अगस्त को राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने उसे अस्वीकार कर दिया. ऐसे में 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से कमेटी बनाने को कैसे गलत कहा जा सकता है?'
जस्टिस वर्मा के लिए पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने इस बात को स्वीकार किया कि कानून में इसे लेकर स्पष्टता नहीं है. रोहतगी का कहना है कि राज्यसभा के चेयरमैन इस्तीफा दे चुके थे. डिप्टी चेयरमैन को नोटिस अस्वीकार करने का फैसला नहीं लेना चाहिए था.
मुकुल रोहतगी ने कहा कि संविधान के सेक्शन 124(5) में सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए कानून द्वारा स्थापित एक प्रक्रिया है, जिसे न्यायाधीश जांच अधिनियम कहते हैं. इसके तहत एक सदन के 50 या दूसरे सदन के 100 सासदों की ओर से प्रस्ताव पर सहमति जरूरी है.
उन्होंने कहा , 'जब एक ही दिन नोटिस दिया जाता है तो उसी दिन कमेटी नहीं बनाई जा सकती, जब तक की दोनों सदन उसको स्वीकार न कर लें और स्पीकर जॉइंट कमेटी न बना लें. इस मामले में 11 अगस्त, 2025 को प्रस्ताव राज्यसभा में खारिज हो गया. 21 जुलाई को प्रस्ताव पेश किया गया. राज्यसभा के चेयरमैन ने उसी दिन रिजाइन कर दिया और 11 अगस्त को डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया. प्रस्ताव खारिज होने के बाद 12 अगस्त को कमेटी बना दी गई.' उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव अमान्य है.
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, 'मान लो कि लोकसभा जज के खिलाफ महाभियोग चलाने के पक्ष में है और 100 सांसद इस पर सहमत हैं. राज्यसभा के 50 सांसद मानते हैं कि जज के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव नहीं लाया जाए, लेकिन उन्हें पता चलता है कि लोकसभा के 100 सदस्यों ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. अब राज्यसभा के 50 सांसद दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रस्ताव लाते हैं और उन्हें 49 सदस्य मिले और एक सदस्य ने दो बार हस्ताक्षर कर दिए और उसी सदन में प्रस्ताव पेश कर दिया. वैसे थे 49 पर उसे 50 दिखाया गया. लेकिन राज्यसभा अध्यक्ष को यह पता चल जाता है और वह इस प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं... तो आपके अनुसार लोकसभा में भी यह खारिज हो गया? ऐसा नहीं हो सकता.' उन्होंने कहा कि अगर एक सदन में प्रस्ताव खारिज हो गया तो दूसरे सदन में क्यों उसे अस्वीकार होना चाहिए.
