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TV, बाइक और 15,000 रुपये कैश के लिए युवती को जिंदा जलाया, दहेज का ये दर्दनाक मामला सुनकर सुप्रीम कोर्ट हैरान


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 दिसंबर, 2025) को देश में सामने आ रहे दहेज के मामलों को लेकर चिंता जताई और कहा कि मौजूदा कानून अप्रभावी और दुरुपयोग दोनों से ग्रस्त हैं और यह बुराई अब भी व्यापक रूप से प्रचलित है. सुप्रीम कोर्ट जिस मामले में सुनवाई कर रहा था, उसमें 20 साल की एक युवती को दहेज के लिए उसके पति और सास ने उसे कैरोसीन का तेल डालकर जिंदा जला दिया था.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दहेज के मामलों से निपटने के लिए सभी के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर जोर देते हुए हाईकोर्ट्स को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-बी और 498-ए के तहत लंबित मामलों की संख्या (सबसे पुराने से लेकर सबसे नए तक) का पता लगाने समेत कई निर्देश जारी किए ताकि उनका शीघ्र निपटान किया जा सके.

कोर्ट ने दहेज को समाजिक बुराई बताते हुए कहा कि इसकी वजह से एक 20 साल की युवती को अपनी जान गंवानी पड़ी. कोर्ट ने कहा, 'सिर्फ 20 की युवती को जघन्य और दर्दनाक मौत के जरिए दुनिया से विदा कर दिया गया. सिर्फ इसलिए कि उसके माता पिता शादी में उसके ससुराल वालों की इच्छाओं को पूरा नहीं कर सके. क्या उसकी अहमियत सिर्फ एक कलर टीवी, एक मोटरसाइकिल और 15 हजार रुपये कैश के बराबर थी, जो उसका परिवार नहीं दे सका.'

भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी दहेज हत्या से संबंधित है, वहीं धारा 498-ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला से क्रूरता से संबंधित है. यह मामला 24 साल पुराना है, जिसमें कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए केंद्र और राज्यों को सभी स्तरों पर शैक्षिक पाठ्यक्रम में आवश्यक बदलावों पर विचार करने का निर्देश दिया, साथ ही इस संवैधानिक स्थिति को मजबूत करने का भी निर्देश दिया कि विवाह के दोनों पक्ष एक दूसरे के बराबर हैं और कोई भी दूसरे के अधीन नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर यह आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने साल 2001 में एक महिला समेत दो आरोपियों को बरी कर दिया था. नसरीन की शादी अजमल बेग से हुई थी. शादी के बाद अजमल और उसका परिवार नसरीन से दहेज की मांग करने लगा. उन्होंने एक कलर टीवी, एक मोटरसाइकिल और 15 हजार रुपये कैश की मांग की, जिसके लिए वे सालों तक उसको प्रताड़ित करते रहे.

साल 2001 में नसरीन को उसके पति और ससुराल वालों ने बहुत परेशान किया और आखिर में उस पर कैरोसिन का तेल ड़ालकर आग लगा दी. जब नसरीन के मामा पहुंचे तब तक नसरीन मर चुकी थी. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने अजमल और उसकी मां को आईपीसी की धारा 304 बी और 498ए के तहत जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई. दोनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी, जहां हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर, 2003 को यह कहते हुए राहत दे दी कि नसरीन के मामा घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं इसलिए उनकी गवाही नहीं मानी जा सकती. इसके बाद यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें स्वीकार कर लीं और मामले में अजमल और उसकी मां की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने 94 वर्षीय महिला दोषी को कारावास की सजा नहीं दी. कोर्ट ने अजमल को निचली अदालत की ओर से दी गई आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए चार हफ्ते के अंदर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि भले ही इस मामले में आरोपियों को आखिरकार सजा मिल गई है, लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ऐसा नहीं होता है.

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