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‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ रिव्यू: शोर नहीं, सन्नाटे में रची गई एक डार्क मर्डर मिस्ट्री


नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ एक ऐसी क्राइम-थ्रिलर है जो शोर, तेज कट्स या लगातार चौंकाने वाले ट्विस्ट पर भरोसा नहीं करती। यह फिल्म धीमी लेकिन गहरी चाल चलती है और दर्शक को धीरे-धीरे अपने अंधेरे संसार में खींच लेती है। यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि इंसानी मानसिकता, सत्ता, वर्गभेद, रिश्तों और समाज की उन सच्चाइयों की पड़ताल है, जो अक्सर चुप्पी के पीछे छिपी रहती हैं।

फिल्म की कहानी बंसल परिवार से शुरू होती है, जो एक बेहद अमीर और प्रभावशाली परिवार है और एक बड़ी मीडिया कंपनी का मालिक है। एक रात अचानक बंसल हवेली में कुछ अजीब घटनाएं घटती हैं, पानी में जहर मिलाने से कौवे मर जाते हैं और उसी रात परिवार के कई सदस्य अपने-अपने बंद कमरों में मृत पाए जाते हैं। हवेली के भीतर डर और सन्नाटा फैल जाता है, और हर जीवित बचा सदस्य किसी न किसी राज को छिपाए हुए लगता है। इस सामूहिक हत्याकांड की जांच की जिम्मेदारी मिलती है इंस्पेक्टर जटिल यादव (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) को। शुरुआती तौर पर मामला पुलिस को आसान लगता है। सिस्टम पर दबाव है कि केस जल्दी सुलझे और शक एक ऐसे परिवार के सदस्य पर डाला जाता है, जो ड्रग एडिक्ट है। लेकिन जटिल को यह रास्ता सही नहीं लगता। उनके अनुभव और सहज बुद्धि उन्हें बार-बार यह महसूस कराती है कि मामला जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। बाद में मामला पलटला है मर्डर का आरोप विक्टिम की दूसरी पत्नी पर मड़ा जाने लगता है, जिसका विक्टिम के भतीजे से ही अफेयर रहा है। इसी बीच शक की सुई एमएलए पर भी जाती है।

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, बंसल परिवार की चमकदार परतें उतरने लगती हैं। हवेली की दीवारों के पीछे छिपी सोच, वर्षों से दबे राज, सत्ता का दुरुपयोग और डर सामने आने लगता है। फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे ताकतवर लोग सच्चाई को दबाने की कोशिश करते हैं, ये भी दिखाया गया है कि कभी-कभी साशन किस तरह इस खेल का हिस्सा बन जाता है। हालांकि फिल्म कई सवाल उठाती है, लेकिन अंत तक पहुंचते-पहुंचते सभी सवालों के सीधे जवाब नहीं देती, बल्कि दर्शक को सोचने के लिए छोड़ देती है।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत निस्संदेह नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हैं। इंस्पेक्टर जतिल यादव के किरदार में वह किसी आदर्श या सुपरहीरो पुलिसवाले की तरह नहीं दिखते। वह एक साधारण इंसान हैं, जो अपने काम के साथ-साथ अपनी निजी टूटन और अकेलेपन से भी जूझ रहा है। नवाजुद्दीन का अभिनय बेहद कंट्रोल्ड है, न ज्यादा ड्रामा, न ज्यादा भावुकता। उनकी आंखों, हाव-भाव और शांत संवाद अदायगी से किरदार की जटिलता साफ झलकती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि नवाजुद्दीन एक बार फिर साबित करते हैं कि वह जटिल किरदारों को सहजता से निभाने में माहिर हैं।

राधिका आप्टे अपने किरदार में रहस्यमयी और प्रभावशाली नजर आती हैं। उनका रोल कहानी में एक अहम कड़ी की तरह काम करता है। वो थोड़ा कम जरूर नजर आईं, लेकिन जितना भी दिखीं कमाल कर गईं। ईला अरुण नवाजुद्दीन की मां के रोल में हैं और वो अपने देसी अंदाज में छोटे किरदार में भी इंपैक्ट डालती हैं। तिग्मांशू धूलिया के किरदार से ज्यादा की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें बहुत सीमित काम मिला है। श्वेता त्रिपाठी से भी ज्यादा काम लिया जा सकता था, वो एक बेहतरीन एक्ट्रेस हैं, लेकिन एक प्रेग्नेंट महिला के रोल में उनका काम भी सीमित है। स्वानंद किरकिरे के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उन्हें भी स्क्रीन स्पेस कम ही मिला है। उनके किरदार में गहराई आती उससे पहले ही कहानी खत्म हो जाती है। भले ही साइड एक्टर्स का रोल सीमित है लेकिन उनकी एक्टिंग में कोई कमी नहीं रही है।

हां जाहिर है कि उनके अधूरे किरदारों को और गहराई दी जी सकती थी, लेकिन मेकर्स का पूरा फोकस मर्डर मिस्ट्री को और गहरा करना था, जो की हुआ भी। कहानी शुरू से लेकर आखिर तक बांधे रखती हैं और जैसे ही आपको लगता है कि अब भेद खुल गया, तुरंत ही कहानी में नया ट्विस्ट आ जाता है। हर सीन में नवाजुद्दीन छाए हुए हैं और वैसे इसका जरा भी खराब प्रभाव स्टोरी टेलिंग पर नहीं पड़ा है। लेखन सधा हुआ है, सस्पेंस, मिस्ट्री सीन दर सीन बढ़ती जाती है। निर्देशक हनी त्रेहान फिल्म को एक रियलिस्टिक टोन में बनाए रखते हैं। वह किसी भी सीन को अनावश्यक रूप से नाटकीय नहीं बनाते और कहानी को जमीन से जुड़ा रखते हैं। यही रियलिज्म फिल्म की ताकत भी है और कहीं-कहीं कमजोरी भी। स्क्रीनप्ले कसाव लिए हुए है, लेकिन इसकी धीमी रफ्तार हर दर्शक को पसंद आए, यह जरूरी नहीं। कुछ हिस्सों में कहानी जरूरत से ज्यादा ठहर जाती है, जिससे फिल्म थोड़ी लंबी महसूस होती है। कुछ, सोच विचार के सीन लंबे खींचे हैं, जांच के सीन भी थोड़ा तेजी से निपटाए जा सकते थे। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मूड को बखूबी पकड़ती है। बंसल हवेली की घुटन, अंधेरा और सन्नाटा स्क्रीन पर महसूस होता है। बैकग्राउंड स्

रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह अमीर और गरीब के बीच की खाई, सत्ता के दुरुपयोग और सच को दबाने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाती है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि अपराध सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि उसके पीछे पूरा सिस्टम और समाज की सोच काम करती है। यही वजह है कि यह फिल्म अंत में साफ जवाब देने के बजाय कई सवाल छोड़ जाती है। हालांकि फिल्म अपने विषय और अभिनय के दम पर प्रभाव छोड़ती है, लेकिन कुछ सबप्लॉट्स अधूरे लगते हैं। सीक्वल होने के बावजूद यह फिल्म हर मामले में पहले पार्ट से आगे नहीं निकल पाती। इसकी गंभीरता और धीमी गति इसे एक सीमित दर्शक वर्ग तक ही सीमित कर देती है। गहरी और गंभीर फिल्में देखने वाले लोगों को ये फिल्म जरूर पसंद आएगी, लेकिन हंसी ठिठोली की तलाश कर रहे लोगों को ये भारी लग सकती है।

कुल मिलाकर ‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ एक गंभीर, डार्क और सोचने पर मजबूर करने वाली क्राइम-थ्रिलर है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का शानदार अभिनय, रियलिस्टिक निर्देशन और मजबूत थीम इसे देखने लायक बनाते हैं। हालांकि धीमी रफ्तार, कुछ अधूरे किरदार और सीमित भावनात्मक जुड़ाव इसे और बेहतर बनने से रोकते हैं। अगर आप तेज रफ्तार, मसालेदार थ्रिलर की उम्मीद लेकर बैठेंगे, तो शायद यह फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट न करे। लेकिन अगर आपको सधी हुई, यथार्थवादी और सोच जगाने वाली क्राइम ड्रामा पसंद है, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है।

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