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भारतीय सेना के अधिकारी ने पाकिस्तान के काले कारनामों पर दिया बड़ा बयान! कहा -अगर भारत उस समय चुप रहता तो यह केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन होता


भारतीय सेना के पश्चिमी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी से उपजा युद्ध बताया है. उनके अनुसार वह समय ऐसा था, जब भारत के पास हस्तक्षेप के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.

उन्होंने कहा, ''पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की तरफ से जो अत्याचार किए जा रहे थे, वे किसी सामान्य युद्ध की हिंसा नहीं थे, बल्कि एक संगठित नरसंहार थे.'' उन्होंने इस हिंसा की तुलना होलोकॉस्ट से भी बदतर बताते हुए कहा कि पूरी दुनिया उस वक्त आंखें मूंदे बैठी थी.

लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने कहा, ''अगर भारत उस समय चुप रहता तो यह केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन होता.'' उन्होंने भावुक लहजे में कहा कि जब हजारों बांग्लादेशी महिलाओं को पाकिस्तानी सैनिकों की ओर से अमानवीय यातनाओं का शिकार बनाया जा रहा था, तब भारत का हस्तक्षेप करना एक नैतिक कर्तव्य था. उनके अनुसार अन्याय के सामने मौन रहना भी अधर्म का ही एक रूप होता है.

1948 के भारत-पाक युद्ध को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सैनिक कबायली लुटेरों का भेष बनाकर कश्मीर में दाखिल हुए थे. उस दौरान आम नागरिकों पर अत्याचार, हत्या और लूटपाट की घटनाएं हुईं, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकतीं.इसके उलट भारतीय सेना ने कश्मीर के नागरिकों की रक्षा को अपना दायित्व माना और सीमित संसाधनों के बावजूद मानवीय मूल्यों का पालन किया.

लेफ्टिनेंट जनरल कटियार के अनुसार 1971 का युद्ध भारतीय इतिहास में धर्मयुद्ध का सबसे स्पष्ट उदाहरण है. उस समय पूर्वी पाकिस्तान में हजारों निर्दोष लोगों की हत्या हो रही थी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगभग मौन था. उन्होंने कहा कि अगर कोई समाज बुराई और अपराध के सामने चुप रहता है, तो उसकी आत्मा को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है. भारत ने उस कीमत को चुकाने से इनकार किया और इतिहास का रुख बदल दिया

1971 के युद्ध के बाद 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण हुआ, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य सरेंडर था. लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने कहा कि भारत ने इन युद्धबंदियों के साथ अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पूरी तरह पालन किया. उन्हें चिकित्सा सुविधा दी गई और मानवीय व्यवहार किया गया. शिमला समझौते के जरिए भारत ने बदले की बजाय शांति का रास्ता चुना, जिसे उन्होंने दुनिया के सबसे उदार शांति समझौतों में से एक बताया.

बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंधों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि बांग्लादेश इस समय एक नाजुक दौर से गुजर रहा है. हालांकि उन्होंने बांग्लादेशी सेना पर भरोसा जताया, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि इतिहास से सबक न लेने वाले देश बार-बार वही गलतियां दोहराते हैं.

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