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तलाक के 3 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने पति को किया तलब


मुस्लिम पुरुषों को एकतरफा तलाक का अधिकार देने वाली तलाक ए हसन समेत दूसरी व्यवस्थाओं पर सुप्रीम कोर्ट विस्तृत सुनवाई करेगा. कोर्ट ने संकेत दिया है कि इनसे जुड़े कानूनी और संवैधानिक सवालों को संविधान पीठ को भेजा जा सकता है. इसके साथ ही कोर्ट ने 3 साल पहले तलाक ए हसन पाने वाली एक महिला के पति को भी अपने सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है.

बेनजीर हिना, नाजरीन निशा समेत कई मुस्लिम महिलाओं ने तलाक के मामले में अपनी कमजोर स्थिति का सवाल उठाया है. इन सभी महिलाओं को उनके पतियों ने एकतरफा तलाक दिया है. इनमें से बेनजीर के पति यूसुफ को बुधवार, 3 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है. 2022 में यूसुफ ने बेनजीर को एक वकील से 3 महीनों में 3 बार तलाक की चिट्ठी भिजवाई थी और खुद दूसरी शादी कर ली थी. बेनजीर आज भी अपने 4 साल के बच्चे को अकेले पाल रही है.

जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने बेनजीर के लिए वकील सैयद रिजवान अहमद पेश हुए. उन्होंने बताया कि यूसुफ ने खुद तलाक देने की बजाय किसी और व्यक्ति के दस्तखत से चिट्ठी भिजवाई. इस तरह यह तलाक मान्य नहीं है. अगर बेनजीर दूसरी शादी करना चाहे तो वह ऐसा नहीं कर सकती. यूसुफ के लिए पेश वरिष्ठ वकील एम आर शमशाद ने माना कि यह गलत था. उन्होंने इसे सुधारने की पेशकश की.

कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से मौजूद याचिकाकर्ता बेनजीर हिना ने बताया कि उन्हें अपने बच्चे का पासपोर्ट बनवाने से लेकर स्कूल में दाखिले तक, हर जगह दिक्कत हो रही है. कहीं भी उन्हें तलाकशुदा नहीं माना जा रहा है. इस पर कोर्ट ने कहा कि वह अपने वकील के जरिए सारी दिक्कतों को संक्षेप में लिख कर दे दें. हर समस्या को दूर कर दिया जाएगा.

एकतरफा तलाक से पीड़ित कई मुस्लिम महिलाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं. उन्होंने कहा है कि संविधान हर नागरिक को कानून की नजर में समानता (अनुच्छेद 14) और सम्मान से जीवन जीने (अनुच्छेद 21) का
अधिकार देता है, लेकिन मजहब के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को इनसे वंचित रखा जा रहा है. याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट अदालती तरीके से न होने वाले सभी किस्म के तलाक को असंवैधानिक करार दे. शरीयत एप्लिकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 रद्द करने का आदेश दिया जाए. साथ ही डिसॉल्युशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 भी पूरी तरह निरस्त हो.

22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ 3 बार तलाक बोल कर शादी रद्द करने को असंवैधानिक करार दिया था. तलाक-ए-बिद्दत कही जाने वाली इस व्यवस्था को लेकर अधिकतर मुस्लिम उलेमाओं का भी मानना था कि यह कुरान के मुताबिक नहीं है. कोर्ट के फैसले के बाद सरकार एक साथ 3 तलाक बोलने को अपराध घोषित करने वाला कानून भी बना चुकी है, लेकिन तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन जैसी व्यवस्थाएं अब भी बरकरार हैं. इनके तहत पति 1-1 महीने के अंतर पर 3 बार लिखित या मौखिक रूप से तलाक बोल कर शादी रद्द कर सकता है.

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