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अकबर के सामने नहीं झुकी ये हिंदू रानी, खुद ही सीने में उतार ली अपनी कटार



भारत के इतिहास में रानी दुर्गावती का नाम साहस और बलिदान के लिए हमेशा याद किया जाता है. वे गोंडवाना राज्य की वीरांगना थीं, जिन्होंने मुगलों के खिलाफ बहादुरी से युद्ध किया और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर किले (बांदा, उत्तर प्रदेश) में हुआ था. उनका जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ, इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया. उनके पिता राजा कीर्तिसिंह चंदेल थे और वे उनकी इकलौती संतान थीं.

रानी दुर्गावती का विवाह गोंडवाना के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ. विवाह के केवल चार साल बाद ही राजा दलपत शाह का निधन हो गया. उस समय उनका पुत्र नरायण मात्र तीन वर्ष का था. पुत्र की अल्पायु अवस्था में ही रानी दुर्गावती ने राज्य की बागडोर अपने हाथों में संभाली. वर्तमान जबलपुर उनके शासन का केंद्र था.

1562 में मुगल बादशाह अकबर की सेना ने गोंडवाना पर आक्रमण किया. सैनिकों की संख्या कम होने के बावजूद रानी दुर्गावती ने डटकर युद्ध का सामना किया. शुरुआत में उनकी सेना ने मुगलों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, लेकिन अगले दिन वे अधिक सैनिकों के साथ लौटे. रानी दुर्गावती अपने सफेद हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में डटी रहीं. युद्ध के दौरान उनका पुत्र घायल हो गया, जिसे उन्होंने सुरक्षित स्थान पर भिजवाया. उनके पास मात्र 300 सैनिक शेष रह गए और स्वयं वे गंभीर रूप से घायल हो चुकी थीं.

घायल अवस्था में उनके सैनिकों ने उनसे जान बचाने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से मना कर दिया. उन्होंने अपने दीवान आधार सिंह से प्राण लेने को कहा, परंतु वे ऐसा नहीं कर सके. अंततः रानी दुर्गावती ने अपनी कटार अपने सीने में भोंककर बलिदान दे दिया. उनका बलिदान मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा का प्रतीक माना जाता है

रानी दुर्गावती का साहस और बलिदान आज भी लोगों को प्रेरित करता है. उन्हें भारत की महान वीरांगनाओं में गिना जाता है और उनकी तुलना महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं से की जाती है. गोंडवाना की यह वीरांगना भारतीय इतिहास में अमर गाथा बन गईं.

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