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बलियाः पंडित वृंदावन मिश्र का सफर राष्ट्रीय थाती के रूप में सहेजना जरूरी


बलिया। एतिहासिक अतीत को जिंदा करना कभी कभार अपरिहार्य हो जाता है। ऐसा ही स्वर्णिम अतीत है स्वतंत्रता सेनानी पंडित वृंदावन मिश्र की। जिनके अवतरण से लेकर अवसान तक का सफर राष्ट्रीय थाती के रूप में सहेजना समय की मांग है और प्रासंगिक भी। शिवपुर दियर में जन्में तथा विरासत के कारण सोबईबांध में गुजर- बसर करने वाले सेनानी की राष्ट्रभक्ति व देश प्रेम की भावना की अग्निपरीक्षा 1921 में सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर आजादी के आखिरी दिन तक निरंतर देखने को भी प्रशासनिक व्यवस्था के कारण आपको 1921 और 1929 में जेल की सजा काटनी पड़ी। 1916 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद बाल गंगाधर तिलक के संपर्क में आ गये। कौन जानता था कि 17 अप्रैल को शिवपुर दियर में अवतरित वृंदावन मिश्र एक दिन बागी बलिया की थाती प्रमाणित होंगे। पंडित मिश्र को सिर्फ आजाद भारत तक सीमित रखना एक सूक्ष्म सीमांकन करना उनके दूरदर्शी मूल्य एवं प्रासंगिकता को छोटा करना है। ये आजादी तक ही नहीं रूके बल्कि उससे भी आगे बढ़कर 1975 में आपातकाल को चुनौती दी। जिला पंचायत सदस्य रहे और शिक्षा विभाग के अध्यक्ष की कुर्सी के सहारे शिक्षा विभाग को आलोकित किया। 17 अप्रैल को स्व. मिश्र की जयंती पर सोबईबांध स्थित वृंदावन मिश्र शिक्षण संस्थान परिसर में उनके प्रतिमा स्थल पर प्रातः नौ बजे सभा का आयोजन किया गया है।  समाजवादी चिंतक अजय बहादुर सिंह, लोकतंत्र सेनानी शुभ्रांशु शेखर पांडेय, संतोष कुमार शुक्ल ने जनपदवासियों से कार्यक्रम में सहभागिता करने की अपील की है।

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