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प्रयागराज: महिलाएं कभी भी असशक्त नहीं थी वह हमेशा ही सशक्त रही है- डॉ भावना


प्रयागराज। “पुरुष की तरह महिलाओं की भी अपनी इच्छा होती है। बदलाव तो हो रहा है मानसिक स्तर पर हर कोई बदले। इस तरह के कार्यक्रम जागरूकता फैलाते हैं। स्त्री के साथ समस्या हैं तो इसका जिम्मेदार पुरुष ही होता है। महिलाओं के प्रश्न होने ही चाहिए । जो परिवर्तन बुद्धिजीवी वर्ग में हो रहा है वो क्या जमीनी स्तर के समाज में भी होना चाहिए। दोष स्त्रियों को ही दिया जाता है। छूट पुरुष वर्ग को ही अधिक मिलती है। एक सीमा तक स्वतंत्रता ठीक है उससे ज्यादा शोषण को बढ़ावा मिलता है।”

ये सब बातें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हिंदी विभाग के सभागार में कहीं। अवसर था 8 मार्च, 2025 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर आयोजित परिचर्चा का और आयोजन करा रहा था इलाहाबाद विश्वविद्यालय का राजभाषा अनुभाग।

विद्यार्थियों ने कविताओं के माध्यम से स्त्री शक्ति पर अपनी बात रखी तथा कहा कि बिटिया तुम्हारी बेचारी नहीं है। बहन है तुम्हारी बेचारी नहीं है। हमें अपने अधिकारों के प्रति सजक होना ही चाहिए। गालियां क्यों महिला प्रधान होती हैं। क्यों पुरुष प्रधान नहीं हो सकती हैं।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सी एम पी डिग्री कॉलेज की डॉ भावना चैहान जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि महिला कभी भी असशक्त नहीं थी वह हमेशा ही सशक्त रही है।सब कुछ देश, काल, वातावरण पर निर्भर करता है। प्राचीन काल में महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार मिले थे महिलाओं का भी उपनयन संस्कार होता था। बालिकाएं भी बालकों के साथी शिक्षा ग्रहण करने जाती थीं। शास्त्रार्थ के समय भी सही उत्तर है या नहीं इसकी जांच के लिए गार्गी जी को रखा गया था। शारीरिक रूप से नारी सशक्त है मानसिक रूप से सशक्त होने की और भी आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्त्रियां अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल किस प्रकार से कर रही हैं। भारत को किसी नारीवादी आंदोलन की आवश्यकता नहीं है। महिलाओं को पीछे करने का कार्य कहीं ना कहीं महिलाएं स्वयं ही करती हैं।

डॉ मनीष, सी एम पी डिग्री कॉलेज ने कहा कि समाज बदलता है परिवर्तन होते रहते हैं । प्राचीन कल में स्त्रियों का स्वर्ण काल रहा है। अब क्यों बदलाव हो गया है। लेकिन अगर परिवार में महिला पढ़ी लिखी है तो वो परिवार समाज से हट कर रहता है। बच्चों को पढ़ाया लिखाया जाता है। अन्य परिवारों में ये धारणा हो सकती है लेकिन कुछ कम। लड़के हमेशा से ही पढ़ने के लिए बाहर जाते रहें हैं। लड़कियों को काफी संघर्ष करना होता है। स्वयं महिलाओं को महिलाओं की पढ़ाई के लिए संघर्ष करना होता है। समाज में आज भी जो छूट लड़कों दी जाती है पर लड़कियां कुछ हद तक इन छूटों से परे हो जाती है। घटनाएं क्यों घटती हैं। लड़के क्यों स्त्री प्रधान घटनाओं को हवा देते हैं। शुरुआत से ही लड़की लड़कों को एक समान रखना चाहिए। जो लड़कियों को सिखाइए वही लड़कों को भी सिखाइए । तभी समाज में महत्वपूर्ण बदलाव होगा । स्त्री को सच में बल मिलेगा।

डॉ जनार्दन ने कहा कि पहली बार बच्चे जब स्कूल में दाखिल होते हैं तो स्त्री प्रधान न होकर पुरुष प्रधान ही क्यों होती है। अब समाज में महिलाओं के कार्य पुरुषों द्वारा भी किए जा रहे हैं । पुरुष खाना भी बना रहे हैं, बर्तन धो रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव करने की आवश्यकता है। प्रश्न स्त्री और पुरुष दोनों पर ही होने चाहिए।

प्रो योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पुरुष और महिलाएं दोनों ही समाज में एक सिक्के के दो पहलू हैं। सबके अपने-अपने दायित्व हैं। सब से बड़ा धन विद्या है। मनुष्य को मनुष्य ही रहने दिया जाय। जीवन में यदि वाद है तो समस्या होगी ही। सामाजिक असुरक्षा हमें ठीक करने चाहिए । लड़के -लड़कियों में समान संभावना होती है। स्वयंवर का अधिकार तो सिर्फ स्त्रियों को है। स्त्रियों की भूमिका केवल खाना बनाना नहीं हैं। पुरुष का कार्य केवल कमाना नहीं हैं। स्त्री विमर्श के साथ संस्कृति विमर्श भी आवश्यक है। बाहरी दुनिया में पहली आवश्यकता है असुरक्षा दूर करना। बाबू सबसे ज्यादा जिससे डरते हैं वो अम्मा ही हैं। कुछ बाते हमें अभिभूत करती हैं कुछ सत्य होती हैं। सत्य पर कई बार बात नहीं होती हैं। हमें हमेशा मध्य में ही रहना चाहिए। आज की व्यवस्था संवेदनशील हो गई है। समाज का संवेदनशील होना आवश्यक है। कुछ कहना भी सांकेतिक हो सकता है। सभी विमर्श आवश्यक हैं। सब समझदार हैं किसी बात पर विशेष बल देने की आवश्यकता है। काम की चर्चा नहीं कार्य होना चाहिए। दूषित मानसिकता स्त्री पर मजाक से शुरू होती है। भाषा मर्यादित होनी चाहिए चाहे हमारे दोस्त क्यों ही न हों।

छात्राओं ने अपने-अपने विचार रखते हुए कहा कि - स्वतंत्रता के साथ सुरक्षा भी आवश्यक हैं। विश्वविद्यालयों के साथ साथ गांव की स्त्रियों पर बात करने की भी आवश्यकता है। ग्रामीण स्त्रियों की भी बात होनी चाहिए । सवालों के जवाब भी आवश्यक हैं । पुराने प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों हैं। जो स्त्री प्रश्न 50 वर्ष पहले थे वह ज्यों के त्यों आज भी हैं। विद्यार्थियों ने स्त्री विमर्श पर अपने विचार रखते हुए कविता, गीत एवं विचारों के माध्यम से अपनी बात रखी। विद्यार्थियों ने कहा कि चाहे स्त्री हो या पुरुष सब की अपनी सीमाएं हैं। समाज की सीमाएं हैं। बदलाव परिवार से ही शुरू होता है। भविष्य से लेकर वर्तमान, भूतकाल में स्त्रियां विमर्श शामिल हैं। अगर आप व्यक्तिगत ठीक हैं तो डरने की आवश्यकता नहीं है। व्यक्तिगत और कार्यालयीन रूपरेखा अलग होने से दिक्कतें होती हैं।

बताते चलें कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय का राजभाषा अनुभाग विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता रहता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला सशक्तिकरण के विविधताओं पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। हिंदी अधिकारी प्रवीण श्रीवास्तव ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। सभी सम्मानित अतिथियों का स्वागत करते हुए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के आयोजन की परिकल्पना को सभी के साथ साझा किया। महिलाओं के सम्मान और विमर्श की बात करते हुए कार्यक्रम का संचालन किया । अतिथियों के प्रति आभार हिंदी अनुवादक हरिओम कुमार ने किया । इस अवसर पर हिंदी विभाग के शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे ।

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