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हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी आज भी लोगों को सच्चाई और इंसाफ़ के रास्ते पर डटे रहने की प्रेरणा देती है-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुहर्रम के मौके पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मैसेज शेयर किया. उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि हजरत इमाम हुसैन (AS) की कुर्बानी आज भी लोगों को सच्चाई और इंसाफ़ के रास्ते पर डटे रहने की प्रेरणा देती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह बलिदान हिम्मत और मजबूत विश्वास की हमेशा रहने वाली ताकत की याद दिलाता है.

मुहर्रम का चांद दिखाई देते ही पूरी दुनिया में इस्लाम के मानने वालों के दिलों में गहरा दुख महसूस होने लगता है. लोग काले कपड़े पहनते हैं, मजलिसें होती हैं और मातम की आवाजें सुनाई देने लगती हैं. इस महीने को बलिदान के तौर पर याद किया जाता है, क्योंकि इसी समय नबी के नवासे इमाम हुसैन (AS) और उनके साथियों को कर्बला की गर्म रेत पर शहीद कर दिया गया था. उनके साथ 72 लोग थे, जिनमें एक छोटा 6 महीने का बच्चा अली असगर भी था, जिसे बहुत प्यासा होने के बावजूद शहीद कर दिया गया.

यह घटना 61 हिजरी की है. उस समय इस्लाम का नाम तो था, लेकिन उसके असली रास्ते को बदलने की कोशिश हो रही थी. यज़ीद इब्ने माविया चाहता था कि इमाम हुसैन (AS) उसकी बात मान लें और उसके हाथ पर सहमति दे दें. वह चाहता था कि लोग उसके हर फैसले को सही मानें, चाहे वह गलत ही क्यों न हो. उसका मकसद था कि लोग सोचें कि गलत काम भी इस्लाम में सही है, लेकिन इमाम हुसैन (AS) जानते थे कि अगर वह गलत के सामने झुक गए तो सच्चाई हमेशा के लिए हार जाएगी और मजलूमों को कभी इंसाफ नहीं मिलेगा, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया कि वह किसी गलत व्यक्ति की बात नहीं मानेंगे.

2 मुहर्रम को इमाम हुसैन (AS) का काफिला कर्बला पहुंचा. उनके साथ केवल 72 वफादार लोग थे. इनमें बुजुर्ग, जवान और छोटे बच्चे भी शामिल थे. दूसरी तरफ यज़ीद की बड़ी सेना खड़ी थी. लेकिन इमाम हुसैन (AS) को अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि अल्लाह पर भरोसा था. 7 मुहर्रम को पानी रोक दिया गया. इसके बाद बच्चों की हालत खराब होने लगी. उनके होंठ सूखने लगे. बच्ची सकीना (स.अ.) बार-बार अपने पिता से पूछती थीं कि पानी कब मिलेगा. छोटा अली असग़र बहुत प्यासे थे. हर तरफ बस प्यास… प्यास… की आवाजें गूंज रही थीं, लेकिन इसके बावजूद इमाम हुसैन (AS) ने गलत के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया.

10 मुहर्रम की सुबह वह दिन आ गया, जब एक-एक करके इमाम हुसैन (AS) के साथी मैदान में गए और शहीद होते गए. हजरत क़ासिम, हजरत अली अकबर और हजरत अब्बास (अ.स.) जैसे कई साथी शहीद हो गए. धीरे-धीरे 71 साथी शहीद हो गए. इसके बाद इमाम हुसैन (AS) अकेले रह गए. वह हर शहीद के पास जाते और फिर अकेले लौट आते. यह पूरी घटना बहुत दुख और सब्र की मिसाल मानी जाती है, जिसमें सच्चाई के लिए बड़ी कुर्बानी दी गई.

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