विपिन बाजपेई
सिंहपुर/अमेठी। शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही के दावों की एक बार फिर पोल खुलती नजर आ रही है। सिंहपुर ब्लॉक संसाधन केंद्र (बीआरसी) में वर्षों से जमे दो कर्मचारियों को हटाने का आदेश जारी होने के महज 24 घंटे के भीतर ही विभाग ने यू-टर्न लेते हुए अपना फैसला वापस ले लिया। इस घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से 5 जून को कार्यालय सहायक आलोक और चंद्रशेखर द्विवेदी को बीआरसी से हटाकर उनके मूल विद्यालयों में कार्यभार ग्रहण करने का आदेश जारी किया गया था। आदेश के बाद शिक्षक संगठनों ने बीआरसी में तैनात कर्मचारियों के कार्य व्यवहार और लंबे समय से जमे रहने को लेकर सवाल उठाए थे। लेकिन हैरत की बात यह रही कि अगले ही दिन एसडीआई हरिओम तिवारी ने बड़ा फेरबदल करते हुए अपना आदेश निरस्त कर दोनों कर्मचारियों को फिर से बीआरसी में बनाए रखने का निर्णय ले लिया।इस पूरे घटनाक्रम को लेकर शिक्षक संगठनों में भारी नाराजगी है।
सवाल उठ रहे हैं कि यदि तबादला आवश्यक था तो आदेश वापस क्यों लिया गया? और यदि आदेश गलत था तो उसे जारी किस आधार पर किया गया?
स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि विभाग की यह कार्यशैली संदेह पैदा करती है और इससे निष्पक्ष प्रशासन की छवि धूमिल होती है।विभाग की ओर से यह तर्क दिया गया है कि जनगणना कार्य और शिक्षक कैशलेस योजना जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रभावित हो रहे थे, इसलिए आदेश वापस लिया गया। हालांकि शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह केवल एक औपचारिक दलील है और वास्तविक कारण कुछ और हो सकते हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विभाग किसी दबाव में झुक गया, या फिर नियम-कायदों से ऊपर कुछ विशेष लोगों को संरक्षण दिया जा रहा है? मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शिक्षक संगठनों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए इसे प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बताया है।
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